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206 : प्रेमचंद रचनावली-6
 


रूपा ने जिरह की-अगर वह पहले खाती है, तो क्यों मोटी नहीं है? ठाकुर क्यों मोटे हैं? अगर ठाकुर उन पर गिर पड़े, तो ठकुराइन पिस जायं।

सोना ने प्रतिवाद किया-तू समझती है, अच्छा खाने से लोग मोटे हो जाते हैं। अच्छा खाने से लोग बलवान होते हैं, मोटे नहीं होते। मोटे होते हैं घास-पात खाने से।

'तो ठकुराइन ठाकुर से बलवान हैं?'

'और क्या अभी उस दिन दोनों में लड़ाई हुई, तो ठकुराइन ने ठाकुर को ऐसा ढकेला कि उनके घुटने फूट गए।'

'तो तू भी पहले आप खाकर तब जीजा को खिलाएगी?'

'और क्या?'

'अम्मां तो पहले दादा को खिलाती हैं।'

'तभी तो जब देखो तब दादा डांट देते हैं। बलवान होकर अपने मरद को काबू में रखूंगी। तेरा मरद तुझे पीटेगा, तेरी हड्डी तोड़कर रख देगा।'

रूपा रुआंसी होकर बोली-क्यों पीटेगा, मैं मार खाने का काम ही न करूंगी।

'वह कुछ न सुनेगा। तूने जरा भी कुछ कहा और वह मार चलेगा। मारते-मारते तेरी खाल उधेड़ लेगा।'

रूपा ने बिगड़कर सोना की साड़ी दांतों से फाड़ने की चेष्टा की और असफल होने पर चुटकियां काटने लगी।

सोना ने और चिढ़ाया-वह तेरी नाक भी काट लेगा।

इस पर रूपा ने बहन को दांत से काट खाया। सोना की बांह लहुआ गई। उसने रूपा को जोर से ढकेल दिया। वह गिर पड़ी और उठकर रोने लगी। सोना भी दांतों के निशान देखकर रो पड़ी।

उन दोनों का चिल्लाना सुनकर गोबर गुस्से से भरा हुआ आया और दोनों को दो-दो घूसे जड़ दिए। दोनों रोती हुई निकलकर घर चली दीं। सिंचाई का काम रुक गया। इस पर पिता-पुत्र में एक झड़प हो गई।

होरी ने पूछा-पानी कौन चलाएगा? दौड़े-दौड़े गए, दोनों को भगा आए। अब जाकर मना क्यों नहीं लाते?

'तुम्हीं ने इन सबों को बिगाड़ रखा है।'

'इस तरह मारने से और निर्लज्ज हो जायंगी।'

'दो जून खाना बंद कर दो, आप ठीक हो जायं।'

'मैं उनका बाप हूं, कसाई नहीं हूं।'

पांव में एक बार ठोकर लग जाने के बाद किसी कारण से बार-बार ठोकर लगती है और कभी-कभी अंगूठा पक जाता है और महीनों कष्ट देता है। पिता और पुत्र के सद्भाव को आज उसी तरह की चोट लग गई थी और उस पर यह तीसरी चोट पड़ी।

गोबर ने घर जाकर झुनिया को खेत में पानी देने के लिए साथ लिया। झुनिया बच्चे को लेकर खेत में आ गई। धनिया और उसकी दोनों बेटियां बैठी ताकती रहीं। मां को भी गोबर की यह उद्दंडता बुरी लगती थी। रूपा को मारता तो वह बुरा न मानती, मगर जवान लड़की को मारना, यह उसके लिए असह्य था।

आज ही रात को गोबर से लखनऊ लौट जाने का निश्चय कर लिया। यहां अब वह नहीं