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208 : प्रेमचंद रचनावली-6
 


नोखेराम ने मसनद पर लेटकर रोब दिखाते हुए कहा-जब तक होरी है, मैं तुमसे लेन-देन की कोई बातचीत नहीं करना चाहता।

गोबर ने आहत स्वर में कहा–तो मैं घर में कुछ नहीं हूं?

'तुम अपने घर में सब कुछ होगे। यहां तुम कुछ नहीं हो।'

'अच्छी बात है, आप बेदखली दायर कीजिए। मैं अदालत में तुमसे गंगाजली उठवाकर रुपये लूंगा, इसी गांव से एक सौ सहादत दिलाकर साबित कर दूंगा कि तुम रसीद नहीं देते। सीधे-साधे किसान हैं, कुछ बोलते नहीं, तो तुमने सभझ लिया कि सब काठ के उल्लू हैं। रायसाहब वहीं रहते हैं, जहां मैं रहता हूं। गांव के सब लोग उन्हें हौवा समझते होंगे, मैं नहीं समझता। रत्ती-रत्ती हाल कहूंगा और देखूंगा, तुम कैसे मुझसे दोबारा रुपये वसूल कर लेते हो।'

उसकी वाणी में सत्य का बल था। डरपोक प्राणियों में सत्य भी गूंगा हो जाता है। वह सीमेंट, जो ईंट पर चढ़कर पत्थर हो जाता है, मिट्टी पर चढ़ा दिया जाए, तो मिट्टी हो जाएगा। गोबर की निर्भीक स्पष्टवादिता ने उस अनीति के बख्तर को बेध डाला, जिससे सज्जित होकर नोखेराम की दुर्बल आत्मा अपने को शक्तिमान समझ रही थी।

नोखेराम ने जैसे कुछ याद करने का प्रयास करके कहा-तुम इतना गर्म क्यों हो रहे हो इसमें गर्म होने की कौन बात है। अगर होरी ने रुपये दिए हैं, तो कहीं-न-कहीं तो टांके गए होंगे। मैं कल कागज निकालकर देखूंगा। अब मुझे कुछ-कुछ याद आ रहा है कि शायद होरी ने रुपये दिए थे। तुम निसाखातिर रहो, अगर रुपये यहां आ गए हैं, तो कहीं जा नही सकते। तुम थोड़े-से रुपयों के लिए झूठ थोड़े ही बोलोगे और न मैं ही इन रुपयों से धनी हो जाऊंगा।

गोबर ने चौपाल से आकर होरी को ऐसा लताड़ा कि बेचारा स्वार्थ-भीरू बूढ़ा रुआंसा हो गया-तुम तो बच्चों से भी गए-बीते हो, जो बिल्ली की म्याऊं सुनकर चिल्ला उठते हैं। कहां-कहां तुम्हारी रच्छा करता फिरूंगा। तुम्हें सत्तर रुपये दिए जाता हूं। दातादीन ले तो देकर भरपाई लिखा देना। इसके ऊपर तुमने एक पैसा भी दिया, तो फिर मुझसे एक पैसा भी न पाओगे। मैं परदेस में इसलिए नहीं पड़ा हूं कि तुम अपने को लुटवाते रहो और मैं कमा-कमाकर भरता रहूं। मैं कल चला जाऊंगा, लेकिन इतना कह देता हूं, किसी से एक पैसा उधार मत लेना और कभी को कुछ मत देना। मंगरू, दुलारी, दातादीन-सभी से एक रुपया सैकड़े सूद कराना होगा।

धनिया भी खाना खाकर बाहर निकल आई थी। बोली-अभी क्यों जाते हो बेटा, दो चार दिन और रहकर ऊख की बोनी करा लो और कुछ लेन-देन का हिसाब भी ठीक कर लो तो जाना।

गोबर ने शान जमाते हुए कहा-मेरा दो-तीन रुपये रोज का घाटा हो रहा है, यह भी समझती हो। यहां मैं बहुत-बहुत दो-चार आने की मजूरी ही तो करता हूं और अबकी मैं झुनिया को भी लेता जाऊंगा। वहां मुझे खाने-पीने की बड़ी तकलीफ होती है।

धनिया ने डरते-डरते कहा-जैसे तुम्हारी इच्छा, लेकिन वहां वह कैसे अकेले घर संभालेगी, कैसे बच्चे की देखभाल करेगी?'

'अब बच्चे को देखूं कि अपना सुभीता देखूं, मुझसे चूल्हा नहीं फूका जाता।'

'ले जाने को मैं नहीं रोकती, लेकिन परदेस में बाल-बच्चों के साथ रहना, न कोई आगे