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244 : प्रेमचंद रचनावली-6
 


तुम्हीं हो। तुम्हारे दरबार में इसका फैसला होना चाहिए।

नोखेराम ने समझाया-भोला, तुम उससे लड़कर पेश न पाओगे। उसने जैसा किया है, उसकी सजा उसे भगवान् देंगे। बेईमानी करके कोई आज तक फलीभूत हुआ है? संसार में अन्याय न होता, तो इसे नरक क्यों कहा जाता? यहां न्याय और धर्म को कौन पूछता है? भगवान सब देखते हैं। संसार का रत्ती-रत्ती हाल जानते हैं। तुम्हारे मन में इस समय क्या बात है, यह उनसे क्या छिपा है? इसी से तो अंतरजामी कहलाते हैं। उनसे बचकर कोई कहां जाएगा? तुम चुप होके बैठो। भगवान् की इच्छा हुई तो यहां तुम उससे बुरे न रहोगे।

यहां से उठकर भोला ने होरी के पास जाकर अपना दुखड़ा रोया। होरी ने अपनी बीती सुनाई-लड़कों की आजकल कुछ न पूछो भोला भाई। मर-मरकर पालो, जवान हों तो दुसमन हो जायं। मेरे ही गोबर को देखो। मां से लड़कर गया, और सालों हो गए, न चिट्ठी, न पत्तर। उसके लेखे तो मां-बाप मर गए। बिटिया का विवाह सिर पर है, लेकिन उससे कोई मतलब नहीं। खेत रेहन रखकर दो सौ रुपये लिए हैं। इज्जत-आबरू का निबाह तो करना ही होगा।

कामता ने बाप को निकाल बाहर तो किया, लेकिन अब उसे मालूम होने लगा कि बुड्ढा कितना कामकाजी आदमी था। सबेरे उठकर सानी-पानी करना, दूध दुहना, फिर दूध लेकर बाजार जाना, वहां से आकर फिर सानी-पानी करना, फिर दूध दुहना, एक पखवारे में उसका हुलिया बिगड़ गया। स्त्री-पुरुष में लड़ाई हुई। स्त्री ने कहा-मैं जान देने के लिए तुम्हारे घर नहीं आई हूं। मेरी रोटी तुम्हें भारी हो, तो मैं अपने घर चली जाऊँ। कामता डरा, यह कहीं चली जाए, तो रोटी का ठिकाना भी न रहे, अपने हाथ से ठोकना पड़े। आखिर एक नौकर रखा, लेकिन उससे काम न चला। नौकर खली-भूसा चुरा-चुराकर बेचने लगा। उसे अलग किया। फिर स्त्री-पुरुष में लड़ाई हुई। स्त्री रूठकर मैके चली गई। कामता के हाथ-पांव फूल गए। हारकर भोला के पास आया और चिरौरी करने लगा-दादा, मुझसे जो कुछ भूल-चूक हुई हो क्षमा करो। अब चलकर घर संभालो, जैसे तुम रखोगे, वैसे ही रहूंगा।

भोला को यहां मजूरों की तरह रहना अखर रहा था। पहले महीने-दो-महीने उसकी जो खातिर हुई, वह अब न थी। नोखेराम कभी-कभी उससे चिलम भरने या चारपाई बिछाने को भी कहते थे। तब बेचारा भोला जहर का घूंट पीकर रह जाता था। अपने घर में लड़ाई-दंगा भी हो, तो किसी की टहल तो न करनी पड़ेगी।

उसकी स्त्री नोहरी ने यह प्रस्ताव सुना तो ऐंठकर बोली-जहां से लात खाकर आए, वहां फिर जाओगे? तुम्हें लाज भी नहीं आती।

भोला ने कहा-तो यहीं कौन सिंहासन पर बैठा हुआ हूं?

नोहरी ने मटककर कहा-तुम्हें जाना हो तो जाओ, मैं नहीं जाती।

भोला जानता था, नोहरी विरोध करेगी। इसका कारण भी वह कुछ-कुछ समझता था, कुछ देखता भी था, उसके यहां से भागने का एक कारण यह भी था। यहां उसकी तो कोई बात न पूछता था, पर नोहरी की बड़ी खातिर होती थी। प्यादे और शहने तक उसका दबाव मानते थे। उसका जवाब सुनकर भोला को क्रोध आया, लेकिन करता क्या? नोहरी को छोड़कर चले जाने का साहस उसमें होता तो नोहरी भी झख मारकर उसके पीछे-पीछे चली जाती। अकेले उसे यहां अपने आश्रय में रखने की हिम्मत नोखेराम में न थी। वह टट्टी की आड़ से शिकार