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गोदान : 45
 


हुई चिड़िया पकड़ली। बोली-तुम्हें भाइयों का डर हो, तो जाकर उनके पैरों पर गिरो। मैं किसी से नहीं डरती। अगर हमारी बढ़ती देखकर किसी की छाती फटती है, तो फट जाय, मुझे परवाह नहीं है।

होरी ने विनीत स्वर में कहा- धीरे-धीरे बोल महरानी। कोई सुने, तो कहे, ये सब इतनी रात गए लड़ रहे हैं। मैं अपने कानों से क्या सुन आया हूं, तू क्या जाने। यहां चरचा हो रही है कि मैंने अलग होते समय रुपये दबा लिए थे और भाइयों को धोखा दिया था, यही रुपये अब निकल रहे हैं।'

'हीरा कहता होगा?'

'सारा गांव कह रहा है। हीरा को क्यों बदनाम करूं।'

'सारा गांव नहीं कह रहा है, अकेला हीरा कह रहा है। मैं अभी जाकर पूछती हूं न कि तुम्हारे बाप कितने रुपये छोड़कर मरे थे? डाढ़ीजारों के पीछे हम बरबाद हो गए। सारी जिंदगी मिट्टी में मिला दी, पाल-पोसकर संडा किया, और अब हम बेईमान हैं। मैं कह देती हूं, अगर गाय घर के बाहर निकली, तो अनर्थ हो जायगा। रख लिए हमने रुपये, दबा लिए, बीच खेत दबा लिए। डंके की चोट कहती हूं, मैंने हंडे भर असर्फियां छिपा लीं। हीरा और सोभा और संसार को जो करना हो, कर ले। क्यों न रुपये रख लें? दो-दो संडों का ब्याह नहीं किया, गौना नहीं किया?'

होरी सिटपिटा गया। धनिया ने उसके हाथ से पगहिया छीन ली, और गाय को खूंटे से बांधकर द्वार की ओर चली। होरी ने उसे पकड़ना चाहा, पर वह बाहर जा चुकी थी । वहीं सिर थामकर बैठ गया। बाहर उसे पकड़ने की चेष्टा करके वह कोई नाटक नहीं दिखाना चाहता था। धनिया के क्रोध को खूब जानता था। बिगड़ती है, तो चंडी बन जाती है। मारो, काटो, सुनेगी नहीं, लेकिन हीरा भी तो एक ही गुस्सेवर है, कहीं हाथ चला दे तो परलै ही हो जाय। नहीं, हीरा इतना मूरख नहीं है। मैंने कहां-से-कहां यह आग लगा दी। उसे अपने आप पर क्रोध आने लगा। बात मन में रख लेता, तो क्यों यह टंटा खड़ा होता। सहसा धनिया का कर्कश स्वर कान में आया। हीरा की गरज भी सुन पड़ी। फिर पुन्नी की पैनी पीक भी कानों में चुभी। सहसा उसे गोबर की याद आई। बाहर लपककर उसकी खाट देखी। गोबर वहां न था। गजब हो गया। गोबर भी वहां पहुंच गया। अब कुशल नही। उसका नया खून है, न जाने क्या कर बैठे, लेकिन होरी वहां कैसे जाय? हीरा कहेगा, आप तो बोलते नहीं, जाकर इस डाइन को लड़ने के लिए भेज दिया। कोलाहल प्रतिक्षण प्रचंड होता जाता था। सारे गांव में जाग पड़ गई। मालूम होता था, कहीं आग लग गई है, और लोग खाट से उठ-उठ बुझाने दौड़े जा रहे हैं।

इतनी देर तक तो वह जब्त किए बैठा रहा। फिर न रहा गया। धनिया पर क्रोध आया। वह क्यों चढ़कर लड़ने गई? अपने घर में आदमी न जाने किसको क्या कहता है। जब तक कोई मुंह पर बात न कहे, यही समझना चाहिए कि उसने कुछ नहीं कहा। होरी को कृषक प्रकृति झगड़े से भागती थी। चार बातें सुनकर गम खा जाना इससे कहीं अच्छा है कि आपस में ताजा हो। कहीं मार-पीट हो जाय तो थाना-पुलिस हो, बंधे-बंधे फिरो, सबकी चिरौरी करो, अदालत की धूल फांको, खेती-बारी जहन्नुम में मिल जाय। उसका हीरा पर तो कोई बस न था, मगर धनिया को तो वह जबरदस्ती खींच ला सकता है। बहुत होगा, गालियां दे लेगी, एक-दो दिन