पृष्ठ:चाँदी की डिबिया.djvu/१४१

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दृश्य २ ]
चाँदी की डिबिया
 

बार्थिविक

[ जैक की ओर उदास भाव से ताकते हुए ]

मेरी इच्छा नहीं होती कि यह मुक़दमा चलाया जाय। ग़रीबों पर मुझे बड़ी दया आती है। अपने पद का विचार करते हुए यह मानना मेरा कर्तव्य है कि ग़रीबों की हालत बहुत ख़राब है। इनकी दशा में बहुत कुछ सुधार की ज़रूरत है। आप मेरा मतलब समझ रहे होंगे। अगर कोई ऐसी राह निकल आती कि मुक़दमा न चलाना पड़ता तो बड़ी अच्छी बात होती।

मिसेज़ बार्थिविक

[ तीव्र स्वर में]

यह क्या कहते हो जाँन? तुम दूसरों के साथ अन्याय कर रहे हो। इसका आशय तो यह है कि हम जायदाद को लोगों की दया पर

छोड़ दें। जिसका जी चाहे ले ले।

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