पृष्ठ:चाँदी की डिबिया.djvu/१४१

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हश्य ३] चाँदी की डिबियां बाधिविक [जैक की भोर उदासः भाव से ताकते हुए ] मेरी इच्छा नहीं होती कि यह मुकदमा चलाया जाय । गरीबों पर मुझे बड़ी दया याती है। अपने पद का विचार करते हुए यह मानना मेरा कर्तव्य है कि गरीबों की हालत बहुत ख़राब है। इनकी दशा में बहुत कुछ सुधार की ग्राप मेरा मतलव समझ रहे होंगे । अगर कोई ऐसी राह निकल आती कि मुकदमा न चलाना पड़ता तो बड़ी अच्छी बात होती । ज़रूरत है। मिसेज़ बार्थिविक [ तीव्र स्वर में] अन्याय यह क्या कहते हो जॉन ? तुम दूसरों के साथ कर रहे हो । इसका प्राशय तो यह है कि हम जायदाद को लोगों की दया छोड़ दें। जिसका जी चाहे ले ले। पर