पृष्ठ:चाँदी की डिबिया.djvu/१८४

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


चांदी की डिबिया [अङ्क ३ दारोगा [ सन्नाटा हो जाता है। अगर हजूर का ख़याल हो कि ये बच्चे अनाथ हैं तो हम उनको लेने को तैयार हैं। मैजिस्ट्रेट हां, हां, मैं जानता हूँ ! लेकिन मेरे पास कोई ऐसी शहा- दत नहीं है कि यह आदमी अपने बच्चों की ठीक तौर से देख रेख नहीं कर सकता। [ वह उठता है और भाग के पास चला जाता है। दारोगा हजूर, इनकी माँ इनके पास आती जाती है। मैजिस्ट्रेट हां, हां ! माँ इस योग्य नहीं है कि बच्चे उसे दिए जाय। [बाप से] तुम क्या कहते हो? १७६