पृष्ठ:जनमेजय का नागयज्ञ.djvu/११२

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तीसरा अङ्क—छठा दृश्य

था। वास्तविक स्थिति कुछ और ही थी, जो सब मनुष्यों के लिये समान है। वह स्त्री जाति के सम्मान का प्रश्न था; नाग और आर्य जाति की समस्या नहीं थी। नाग परिणय से तो मै न्याय पाने की भी अधिकारिणी न थी। किन्तु क्या आपको विदित है कि कितने ऐसे शुद्ध आर्यों का भी अधिकारियों के द्वारा प्रतिदिन बहुत अपमान होता है, जो राज सिंहासन तक नहीं पहुँँच पाते। पर अब उन बातों की चर्चा हो क्या!

वपुष्टमा―किन्तु बहन, मैं तो किसी ओर की नही रही। सम्राट् की इच्छा क्या होगी, कौन जाने। आर्यावर्त भर में यह बात फैल गई होगी कि साम्राज्ञी―।

सरमा―भगवान की दया से सब अच्छा ही होगा; आप चिन्तित न हों। चलिए, स्नान कर आवें।

[ दोनों जाती हैं ]
 

आस्तीक―क्यों माणवक, आज तो तुम्हारे समस्त अपमान का बदला चुका गया! क्या अब भी तुम इस दुखिया रानी को शुद्ध हृदय से क्षमा न करोगे।

माणवक―भाई! मैं तो वपुष्टमा को कभी का क्षमा कर चुका। नही तो अब तक पकड़कर नागों के हाथ सौंप देता। माँ की आज्ञा मैं टाल नहीं सका। आस्तीक, यदि सच पूछो तो मैंने इस प्रतिहिंसा का आज से परित्याग कर दिया। देखो, इस तपोवन मे शस्य श्यामल धरा और सुनील नभ का, जो एक दूसरे से इतने दूर हैं, कैसा सम्मिलन ह!