पृष्ठ:जनमेजय का नागयज्ञ.djvu/४६

विकिस्रोत से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
३९
पहला अङ्क―छठा दृश्य

दूस० विद्यार्थी―और तुम गुरुकुल में क्यो आए हो? सब से तो पूछ रहे हो; पहले अपनी तो बताओ।

त्रिविक्रम―पहले तुम बताओ।

दूस० विद्यार्थी―प्रश्न मेरा है।

त्रिविक्रम―मैं तो इनसे पूछता था। तुम क्यो बीच में कूद पड़े? अब पहले तुम्हीं बताओ।

दूस० विद्यार्थी―मैं तो पुरोहित बनूँगा।

त्रिविक्रम―उत्तम! यजमान की थोड़ी सी सामग्री इतस्ततः करके, कुछ जला कर, कुछ जल मे फेक कर, कुछ वितरण करके और बहुत-सी अपनी कमर मे रख कर एक संकल्प का जमा खरच सुना देना, और उसको विश्वास दिला देना कि अज्ञात प्रदेश मे तुम्हारी सब वस्तुएँ तुम्हे मिल जायँगी। अरे भाई! इससे अच्छा तो यह होता कि तुम बन्दर और बकरे को नचाने की विद्या सीख कर डमरू हाथ में लेकर घूमते।

पह० विद्यार्थी―तुम मूर्ख हो! तुम्हारे मुँह कौन लगे!

दूस० विद्यार्थी―अच्छा तुम क्या करने आए हा? और पढ़ कर क्या करोगे?

त्रिविक्रम―मैं! अपनी प्रकृति के अनुसार काम करूँगा, जिसमें आनन्द मिले। और केवल पुरोहिती करने के लिए जो तुम इतनी माथापच्ची कर रहे हो, वह व्यर्थ है। भला पुरोहिती म पढ़ने की क्या आवश्यकता है? जो मन्त्र हुआ, उच्च स्वर से अट्ट- सट्ट पढ़ते चले गए और दक्षिणा रखाते गए। बस हो चुका।