पृष्ठ:जनमेजय का नागयज्ञ.djvu/४८

विकिस्रोत से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
४१
पहला अङ्क―छठा दृश्य

त्रिविक्रम―परिश्रम तो व्यर्थ ही किया जाता है। तिस पर समझने के लिये परिश्रम करना तो सब से भारी मूर्खता है। हट चलिए; वह आ रही हैं।

[ वेद और त्रिविक्रम का प्रस्थान। दामिनी का प्रवेश। ]

दामिनी―उत्तङ्क नही आया। मेरी कामना के लक्ष्य! उत्तङ्क! पुण्यक के बहाने मैंने तुझे बुलाया है। एक बार और परीक्षा करूँगी।

[ मणिकुण्डल लिए हुए उत्तङ्क का प्रवेश ]

उत्तङ्क―आर्या, मैं उत्तङ्क प्रणाम करता हूँ।

दामिनी―कौन उत्तङ्क! तुम आ गए?

उत्तङ्क―हॉ देवि, मणिकुण्डल भी प्रस्तुत हैं!

दामिनी―उत्तङ्क! मुझे अपने हाथो से पहना दो।

उत्तङ्क―देवि, क्षमा हो; मुझे पहनाना नहीं आता।

दामिनी―उत्तङ्क! तुम मुझे छूने से हिचकते क्यो हो?

उत्तङ्क―नहीं देवि, मुझे गुरु ऋण से मुक्त करें; मै जाऊँ!

दामिनी―तो चले ही जाओगे? आज मैं स्पष्ट कहना चाहती हूँ कि―

उत्तङ्क―चुप रहो देवि! यदि ईश्वर का डर न हो, तो संसार से तो डरो। पृथ्वी के गर्भ मे असंख्य ज्वालामुखी है, कदाचित् उनका विस्फोट ऐसे ही अवसरो पर हुआ होगा। तुम गुरु पत्नी हो, मेरी माता के तुल्य हो।

[ सवेग प्रस्थान ]
 

दामिनी―धिक्कार है मुझे!

[ प्रस्थान ]