पृष्ठ:जनमेजय का नागयज्ञ.djvu/५२

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दूसरा अङ्क―पहला दृश्य

आस्तीक―बहन, तुम न जाने कैसी और कहाँ की बातें करती हो। उन बातों का इस वर्तमान जीवन से भी कोई सम्बन्ध है या नहीं?

मणिमाला―वे इसी लोक की बातें है। मुझसे तो मानो कोई कहता है कि महाशून्य मे विश्व इसीलिये बना था। यही उद्देश्य था कि वह एक निर्मल स्रोतस्वती की तरह नील वनराजि के वीच, यूथिका की छाया में वह चले, और उसकी मृदु वीचि से सुरभित पवन के परमाणु आकाश की शून्यता को परिपूर्ण करें।

आस्तीक―क्या तुम कोई स्वप्न सुना रही हो?

मणिमाला―भाई, यह स्वप्न नहीं है, भविष्य की कल्पना भी नहीं है। जब सन्ध्या को अपने श्याम अङ्ग पर तपन रश्मियो का पीला अङ्गराग लगाए देखती हूँ और फिर उस सुनहले शून्य में बसन्त की किसी कोकिल को गाते हुए उड़ जाते देखतो हूँ, तब हृदय मे जो भाव उत्पन्न होते हैं, वे स्वयं मेरी समझ मे भी नहीं आते। किन्तु फिर भी जैसे कोई कहता हो कि उस सुदूरवर्ती शून्य क्षितिज के प्रत्यक्ष से उस कोकिल का कोई सम्बन्ध है।

आस्तीक―क्यो मणि, यह सब क्या है? इसका कुछ तात्पर्य भी है, या केवल कुहुक है? इन मांस पिंडो मे क्यों इतना आक- र्षण है, और कही कही क्या ठीक इसके विपरीत है? जिसको स्नेह कहते हैं, जिसको प्रेम कहते हैं, जिसको वात्सल्य कहते हैं, वह क्यो कभी कभी चुम्बक के समान उसके साथ के लिये दौड़