पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/१२०

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( १०० ) तुम टारन भारन्ह जग जाने । तुम सुपुरुप जस करन बखाने ॥ संसार का भार टालना, विपत्ति से उद्धार करना, अन्याय और अत्याचार का दमन करना ही क्षात्र धर्म है । इस क्षेत्र धर्म का अत्यंत उज्ज्वल स्वरूप इन दोनों वीरा के याचरण में झलकता है । । कवि ने बादल की छोटी अवस्था दिखाकर ऑौर उसकी नवागता वधू को लाकर कर्तव्य की एक बड़ी कड़ी कसौटी सामने रखने के साथ संपूर्ण प्रसंग को अत्यंत मर्मस्पर्शी बना दिया । बादल युद्धयाना के लिये तैयार होता है । । उसकी माता स्नेहवश युद्ध की भीषणता दिखाकर रोकना चाहती है । इसपर वह अपने बल के विश्वास की दृढ़ता दिखाता है । इसके पीछे उसकी तुरंत की श्राई हुई वधू सामने आकर खड़ी होती है, पर वह हृदय को कठोर करके मुंह फेर लेता है तब धनि कीन्हि बिसि चख दीठी। बादल तबहि दीन्हि फिरि पीठी । मुख फिराइ मन अपने रीसा । चलत न तिरिया कर मख दीसा । है यह कर्तव्य की कठोरता है । फिर स्त्नी फेंटा पकड़ती है; पर बादल छुड़ाकर अपना कर्तव्य समझाता है जौ तुर्द गबन माइ गजगामी 1 गवन मोर जहाँ मोर स्वामी ॥ कर्तव्य की यह कठोरता कितनी सुंदर गौर कितनी मर्मस्पशनी है । इस श्रादर्श क्षत्नियवीरता के अतिरिक्त दोनों में यक्तिपटता का व्यक्तिगत गुण भी हम पूरा पूरा पाते हैं । सोलह सौ पालकियों के भीतर राजपूत योद्धाओं को बिठाकर दिल्ली ले जाने की युक्ति इन्हीं दोनों वीरों की सोची हुई थी, जो पूरी वृद्ध वीर गोरा ने अपने पुत्र बादल को ६०० के साथ सरदारों छूटे हुए राजा को पहुँचाने चित्तौर की ओोर भेजा और श्राप केवल एक हजार सरदारों को लेकर बादशाही फौज को तब तक रोके रहा ! जबतक राजा चित्तौर नहीं पहुँच गया अंत में उसी युद्ध में वह वीरगति को प्राप्त हा । उसके पेट में साँग धंसी और ऑाँतें जमीन पर गिर पड़ीं पर प्रांतों को बाँधकर वह फिर घोड़े पर सवार हो लड़ने लगा । उसी समयं चारण ने साधुवाद दिया भाँट कहा, धनि गोरा ! तू भ रावन राव । ग्राँति समेटि बाँधि के, तुरय देत है । पाब ॥ बादल भी रत्नसेन मत्य के चित्तौर रक्षा की पीछे गढ़ की में फाटक पर मारा गया । बादल की रही--बादल की रनी का चित्रण बराबर तो सामान्य स्त्री के रूप म है पर अंत में वह अपना वीरपनी श्रेौर क्षनाणी का रूप प्रकट करती है । जब उसने देखा कि पति किसी प्रकार युद्ध से विमुख न होंगेतब वह कहती है जौ तुम कंत ! जूझ जिउ बाँधा। तुमपिउ ! साहस, में सत बाधा । है रन संग्राम जूशि जिति आबहु 1 लाज होइ जौ पीठि देखावह 18