पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/१३९

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( ११९ ) ऐस जो ठाकुर किय एक दाऊँ। पहिले रचा मुहम्मद नाई ॥ हिंदू पौराणिक भावना के अनुसार भी सृष्टि का जहाँ वर्णन होगा वहाँ यही अभिप्राय प्रकट होगा कि ईश्वर ‘सृष्टि करता है’ अथत बराबर करता रहता है। ग्राद म उत्पत्ति का गेहूँ स्वर्ग की अौर खाने के अपराध में आा दम हौवा के से निकाले जाने का उल्लेख भी है-- जबहीं किएछ जगत सब साजा । अादि चहे आादम उपराजा ॥ खाएनि गोर्चा कुमति भभ लाने । परे आइ जग , पछिताने ॥ अखरावट) छोह न कन्ह निछे ही ग्राह । का हन्ह दोष लाग एक गर्ग ॥ (पदमावत) स् ति वंड' में यह इलामी विश्वास भो मौजूद है कि ईश्वर ने पहले नूर पैगंबर) या ज्योति उत्पन्न की ऑौर मुहम्मद ही को बातिर से स्वर्ग और ध्वी की रचना की कोन्हेसि प्रथम जोति परगाम कोन्हेसि तेहि पिरोति कविलागू कविलास' शब्द का प्रयोग जायसी ने बराबर स्वर्ग के अर्थ में किया है । यह तो प्रसिद्ध ही है कि यहूदियों के पुराने पैगंबर मूसा की उस सष्टिकथा को । इसाइयों ने भी माना और मुसलमानों ने भी लिया जिसके अनुसार ईश्वर ने छह दिन में नाकाश, पृथ्वी, जल तथा वनस्पतियों और जोवों को लग अलग उत्पन्न किया और अंत में मनुष्य का पुतला बनाकर उसमें अपनी रूह नृकी । इसलाम में आकर सृष्टि की इस पौराणिक कथा में दो एक बातों का अंतर पड़ा। मसा के खुदा को स टि बनाने में छह दिन लगे थे, पर अल्लाह ने सिर्फ कुन' कहकर एक क्षण में सारी सष्टि खड़ी कर दी। ज्योति की प्रथम उत्पत्ति का उल्लेख मसा के वर्णन में भी है पर इसलाम में उस ज्योति का अर्थ मुहम्मद का नर’ किया जाता है । कहने की आवश्यकता नहीं कि सृष्टि का उक्त पैगंबरी वर्णन किसी तात्विक क्रम पर नहीं है । जायसी ने भी प्रारंभ में ज्योति का नाम लेकर फिर आगे किसी क्रम का ग्र सरण नहीं किया है । । वे सिर्फ वस्तुएँ गिनाते गए हैं। : पर ‘पदमावत’ में एक स्थान पर भूतों की उत्पत्ति का क्रम इस प्रकार कहा गया है पवन होइ भा पानी, पानी ह।इ भइ आागि । आागि होइ भइ माटी, गोरखधंधे लागि ॥ यह क्रम तैत्तिरीयोपनिषद में जो क्रम कहा गया है उससे नहीं मिलता। तैत्तिरीयोपनिषद् में यह क्रम है--प्रामा (परमात्मा) से आाकाश, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल ऑौर जल से पवी । यह क्रम इस आधार पर है कि पहले एक गुण का पदार्थ हुआा, फिर उससे दो गुणवाला और फिर उस दो गुणवाले से तीन गुणबाला ; इसी प्रकार बराबर होता गया । पर जाय सो का क्रम किस आधार पर है, नहीं कहा जा सकता। हां, पाँच भूतों के स्थान पर जायसी ने जो चार ही कहे हैं वह प्राचीन यूनानियों के विचार के अनुसार है जिसका प्रचार अरब प्रादि देशों में हुआ। प्राचीन पाश्चात्यों की भूतकना इतनी सूक्ष्म न थी कि वे भूतों के अंतर्गत आाकाश को लेते । नाकाश के संबंध में अरब और फारस