पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/१४०

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


( १२० ) आादि मुसलमानी देशों के जनसाधारण की भावना भी बहुत स्थल थी। वे उसे नक्षत्रों से जड़ा हुमा एक शामियाना समझते थे, इसी से जायसी ने कहा है गगन अंतरिख राखा, बाज खंभ बिनु टेक । ‘अखरावट' में उपनिषद् की कुछ बातें कहीं कहीं ज्यों की त्यों मिलती हैं । आत्मा के संबंध में जायसी कहते । हैं पवन चाहि मन बहुत उताइल । तेहि में परम आयु सुटि पाइल मन एक खंड न पहुँच पावै । आासु भुवन चौदह फेिरि नावे । पवनहि महें जो जापु समाना। सब भा बरन जो ग्राषु अमाना । जैत डोलाए बेना डोलै । पवन सबद होइ किसृह न बोले ॥ यही बात ईशोपनिषद् में कही गई है अनेजदेक मनसो जवोयो नैनलेवा प्नुवन् पूर्व मण्त् । तलावतोन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ॥ ४ ॥ अर्थात्--छात्मा प्रचल मन से अधिक वेगवाला है, इंद्रियाँ उसको नहीं पा सकतीं । वह मन, इंद्रिय ग्रादि दौड़नेवालों से ठहरा हुआा भी, परे निकल जाता है और उसी को सत्ता से वायु में कर्मशक्ति है । सारांश यह है कि अद्वैतपक्ष मान्य होने पर भी जायसी ने अन्य पक्षों की भावना द्वारा उद्घाटित स्वरूपों का भी पूरे श्रौत्सुक्य के साथ अवलोकन किया है । सूक्ष्म औौर स्थूल दोनों प्रकार के विचारों का समावेश उनमें है । जगह जगह उन्होंने संसार को ग्र सत्य औौर माया कहा है जिससे मूल पारमाथिक सत्ता का केवल ग्रात्म स्वरूप होना ध्वनित होता है । साथ ही, जगत् को दर्पण कहना, नामरूपात्मक दृश्यों को प्रतिबिंब या छाया कहना यह सूचित करता है कि प्रचित् को ब्रह्म तो नहीं कह सकतेपर है वह उसी रूप की छाया जिस रूप में यह जगत दिखाई पड़ता है । दूसरी ओोर ईश्वर की भावना कर्ता या केवल निमित्त कारण के रूप में भी सृष्टि वर्णन में उन्होंने की है । । यहीं तक नहीं, कहीं कहीं उन्होंने हिंदू और मुसलिम भावना का मेल भी एक नए और अच्छे ढंग से किया है । इस प्रकार के परस्पर भिन्न सिद्धांतों की झलक से यह लक्षित होता है कि उन्होंने जो कुछ कहा है वह उनके तर्क या ‘ब्रह्मजिज्ञासा' का फल नहीं है, उनकी सार ग्राहिणी और उदार भावुकता का फल है, उनके अनन्यप्रेम का फल है । इसी प्रेमाभिलाप की प्रेरणा से प्रेमी भक्त उस अखंड रूपज्योति की किसी न किसी कला के दर्शन के लिये सृष्टि का कोना कोना झाँकता । है, प्रत्येक मत और सिद्धांत की औोर आंख उठाता है और सर्वत्र जिधर देखता है उधर उसका कुछ न कुछ ग्राभास पाता है। यही उदार श्र त्ति सब सच्चे भक्तों की रही है । जायसी की उपासना ‘माधुर्य भाव' से, प्रेमी और प्रिय के भाव से है । । उनका प्रियतम संसार के परदे के भीतर छिता हुया है । जहाँ जिस रूप में उसका प्राभास कोई दिखाता है वहाँ उसी रूप में उसे देख ये गदगद होते हैं । वे उसे पूर्णतया ब्रूय या प्रमेय नहीं मानते । उन्हें यही दिखाई पड़ता है कि प्रत्येक मत अपनो पहुँच के अनुसार, अपने मार्ग