पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/१५७

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( १३७ ) आाश्चर्य नहीं । जायसी सिंहलद्वीप को चित्तौर से पूरब समझते थे, जैसा कि इस चौपाई से प्रकट होता है पच्छिऊँ कर बर, पुरुब क बारी जोरी लिखी न होड़ निनारी ॥ लंका को वे सिंहल के दक्षिण मानते थे, यह बात उस प्रसंग को ध्यान देकर पढ़ने से विदित हो जाती है जिसमें सिंहल से लौटते समय तूफान में बहकर रत्नसेन के जहाज नष्ट हुए थे । जायसी लिखते हैं कि जहाज आधे समुद्र में भी नहीं पाए थे कि उत्तर की हवा बड़े जोर से उठी -- ग्राधे समुद ते आए नाहीं । उठी बाढ़ ऑाँधी उतराहीं ॥ इस तूफान के कारण जहाज भटककर लंका की ओर चल पड़े- बोहित चले जो चितउर ताके । भए कुपंथ लंक दिसि हाँके उत्तर की ओर से ग्राँधी थाने से जहाज दक्षिण की ओर ही जायेंगे । इससे लंका सिंहल से दक्षिण की ओोर हुई। इस प्रज्ञान के होते हुए भी जनता के बीच प्राचीन काल की विलक्षण स्मृति का आभास पदमावत में मिलता है । भारत के प्राचीन इतिहास का विस्तृत परिचय रखनेवाले मात्र यह जानते होंगे कि प्राचीन हिंदुओं के अर्णवपोत पूर्ण समुद्रों में बराबर दौड़ा करते थे। पच्छिम के समुद्रों में जाने का प्रमाण तो वैसा नहीं मिलता पर पूय समुद्रों में जाने के चिह्न अब तक वर्तमान हैं । सुमाता, जावा आदि द्वीपों में हिंदू मंदिरों के चिह्न तथा गुंटूर बाली लंबक आादि द्वीपों में हिंदुओं की बस्ती अब तक पाई जाती है । बंगाल की खाड़ी से लेकर प्रशांत महासागर के बीच होते हुए चीन तक हिंदुओं के जहाज जाते थे। ताम्रलिप्ति (आाधुनिक तमलूक जो मेदिनीपुर जिले ) पूर्व समुद्र में में हैऔौर कलिंग में जाने के लिये प्रसिद्ध बंदरगाह थे। फाहियान नाम चंद्रगुप्त के समय भारतवर्ष चीनी यात्नी, जो द्वितीय में आया था, ताम्रलिप्ति ही से जहाज पर बैठकर सिंहल औौर जावा होता हुआ अपने देश को लौटा था। उड़ीसा के दक्षिण कलिग देश में कोरिंगापटम कलिग ( बाली और पट्टन) नाम का एक पुराना नगर अब भी समुद्र तट पर है । लंबक टापुओं के हिंदू अपने को कलिग ही से माए हुए बताते हैं । जायसी के समय में यद्यपि हिदुओं का भारतवर्ष के बाहर जाना बंद हो गया था पर समुद्र के उस पुराने घाट (कलिग) की स्मृति बनी हुई थी-- मागे पाव उठंसा, बाएँ दिए सो बाट । दहिनाबरत देइ उतरु समुद के घाट ॥ यहीं तक नहीं, पूर्वीय सद्र विशेष बातें भी उस समय तक लोक की कुछ स्मृति में बनी थीं। प्रशांत महासागर में से हुई के दक्षिण भाग दंगों बने हुए टाल बहत हैं कहीं की तह जमते टीले से । कहीं दंगों जमते बन जाते हैं । कपूर निकालने वाले पेड़ भी प्रश्र के प्रशांत महासागर टापुओं में । इन दोनों बहुत हैंबात पर प्राचीन समुद्रयात्रियों का ध्यान विशेष रूप से गया होगा । इनका स्मरण जनता के बीच बना हुआ था, इसका पता जायसी इस प्रकार देते हैं