पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/२०१

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जन्म खड

जन्म खड १४ " ।। जौ लगि मैं फिर भाव मन चित धरह निवारि । सुनत रहा कोइ दुरजनराजहि कहा विचारि ॥ ७ ॥ राजा सुना दीठि मैं माना। बुधि जो देहि ढंग सुना सयाना ॥ भएज रजायसु मारह सूछा। सूर सुनाव चाँद जहूँ ऊ। सत्डू सुथा के नाऊ वार । सुनि धाए जस धाव मंजारी ॥ तब लगि रानी सुना छपावा। जब लगि व्याध न आने पावा । पिता क घायणु माथे मोरे। कहृहु जाय विनवों कर जोरे ॥ पंधि न कोई होझ सुजानू । जानें भुगुति, कि जान उड़ान सुा जो पट्टे पढ़ाए बैना। तेहि कत बुधि जेहि हिये न नैना ॥ मानिक मोती देखि वह, हिये न ज्ञान करेड । दारि* दाख जानि , अबहि ठोरि भरि लेइ ॥ ८ ॥ वै तो फिरे उतर आस पावा। बिनवा सुग्रा हिये डर खावा ॥ रानी तुम जुग जुग सुख पाऊ । होइ अज्ञा बनवास तो जाऊँ। मोतिहि मलिन जो हैोई गइ कला । पुनि सो पानि कहाँ निरमला ? ॥ ठाकुर अंत चहै जेहि मारा। तेहि सेवक कर कहाँ उबारा ? ॥ जेहि घर काल मजारी नाचा। पविहि नार्वे जीउ नहि बाँचा ॥ मैं तुम्ह राज बहुत सुख देखा। जौ पूछहि दे जाइ न लेखा ॥ जो मन बिनु इच्छा कोन्ह सो ग़वा । यह पठिताव चयो सेवा ॥ मारे सोइ निसोगा, डरें न अपने दोस। केरा केलि करै का, जौ भा बैरि परोस ॥ । रानी उतर दीन्ह के माया । जौ जिच जाइ रहै किमि काया ? ॥ तू प्रान परेवा। धोख न लाग करत तोह सेवा ॥ तोह सेवा विgग्न नहि माखाँ पीजर हिये बालि के राखाँ हीं मानुसतू पंखि पियारा। धरम क प्रीति तहाँ केइ मारा ? का सो प्रीति तन माँह बिलाई ? सोइ प्रीति जिउ साथ जो जाई ॥ प्रीति मार द हिये न सोनू । ओोहि पंथ भल होइ कि पोनू ॥ प्रीति पहार भार जो काँधा। सो कस लुटे, लाइ जिउ बाँधा ॥ सुप्रटा रहै सुरुक जिजअबहुि काल सा आाव । सत्रु है जो करिया, कबहूं सो बोरे नाव 1१०। ' (८) मजारी = माजरीबिल्ली । (६) पानि = आबआभाचमक, जवा खाया । बैरि = बेर का पेड़ । (१०) ग्राखों = (सं० आकांक्षा) चाहती हूँ, अथवा (० नाख्यान, पंजाबी-ग्रा न) कहती हैं । करिया = कर्णधारमल्लाह ।