पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/२०३

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मानसरोदक खड

मानसरोदक खंबेड २ । क श्रोनई घटा परी जग छाँहा। ससि की सरन लीन्ह जनु राहाँ ॥ छपि गें दिनहि भानु के दसा। लेइ निसि नखत चाँद परगसा ॥ भ लि चकोर दीडि मुख लावा। मेघघटा महें चंद देखावा ॥ दमन दामिनी, कोकिल भाख़ी। भौंहें धनुख गगन लेइ राखी ॥ नैन खंजन दुह केलि कहींकुच नाग मधुकर रस लेहीं । सरवर रूप बिमोहा, हिये हिलोरह लेइ। पाँव खुई मकुछ पार्षों एहि मिस लहरह देइ । ४ ॥ धरी तीर सब कंचुकि सारी। सरवर महें पैठीं सब बारी ॥ पाइ नीर जानौं सैव बेली । हुलसहि करह काम के केली ॥ करिल केस बिसहर बिसभरे। लहरें लेहि कर्बल मुख धरे ॥ नवल बसंत सवारी करी। होई प्रगट जानह रस भरी ॥ उठी कोष जस दारिवं दाखा । भई उनंत प्रेम के साखा ॥ सरिवर नहि समाइ संसारा लेइ । चाँद नहाइ पैठ तारा ॥ धनि सो नीर ससि तरई ऊईकित दीठ कमल न कूई ॥ । अब चकई विलुरि पुका, कहाँ मिलीं, हो नाहें। एक चाँद नि िसरग महूँदिन दूसर जल माहें 1 ५ ॥ लागीं केलि करै मझ नीरा । हंस लजाइ बैंठ ओोहि तीरा । पदमावति कौतुक कहें राखी । लूम ससि होहु ताइन्ह साखी । बाद मेलि के खेल पसारा। हार देइ जो खेलत हारा । सेंबरिहि साँवरि, गोरिहि गोरी। आापनि आापनि लन्ह सो जोरी ॥ कि खेल खेलां एक साथा। हार न हो पाए हाथा ॥ अंज हि खेलबहरि कित होई । खेल गए कित खेलें कोई ? " धनि सो खेल खेल सह पेमा । रउताई औी कूसल खेमा ? " हमद बाजी प्रेम के ज्यों भावै त्यों खेल । तैल फूलहि के संग ज्यों होइ फुलायल तेल ॥ ६ ॥ सखी एक तेइ खेल न जाना। मैं अचेत मनिहार गवाँना ॥ कर्नूल डार गहि में बेकरारा । कासों पुकारों ओपन हारा कित खेले श्राइर्ड एहि साथा। हार केवाइ चलिएँ लेइ हाथा । पैठत छब यह हारू । कौन उतर पाउब पैसारू । नैन सीप ग्राँसू तस भरे। जानौ मोति गिर्राहि सब ढरे । सखिन कहा बौरी कोकिला। कौन पानि जेहि पौन न मिला ? हार केवाइ सो ऐसे रोवा। हेरि हेराइ लेइ जो खोवा ॥ घर डेल = बहेलिए का डला (४) खोंपा = चोटी का गुच्छा, जूरा। मुक लाई = खोलकर । मकु = कदाचित् । (५) करिल = काले बिसहर = विषधर सर्ष। करी = कलीग कोंप कोंपल । उनंत = झुकती हुई । (६) साखी = निर्णयकर्तापंच । बाद मेलि के = बाजी लगाकर ।