पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/२२१

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नखशिख खंड

नखशिख खंड ३३ वनि बान आस ओोषm. वे रन बन ढॉद । सौजहि तन सब रोव, पंखिहि तन संब पाँच ॥ ६ ॥ नासिक खरग देखें कह जोगू । ग्रग रवीन, वह बदनसँगोलू ॥ नासिक देखि लजानेउ सुथा। सूक नाइ वेसरि होइ ऊा !। सुना गो सिग्रर हिरामन ल। जा । और भाव का बरन राजा ॥ ग्रा, सो नाक कटोर पंवारी। वह कोंवर तिल-पृह सँवारी ॥ पासा हुप सुगंध करह एहि आासा। मड हिकाइ ने इ हम्ह । धर दसान पर नासिक सोभा । दरिटें बिक देखि सुक लोभा !। खंजन ड्हें दिमि लि कराहीं। दहें वह रस कोउ पावं नित नाहीं देखि अमिय यस अधरन्ह, भएउ नासिका कीर । पौन वास पहचाव, ग्रस रस बराड़ न तीर। अधर गुरंग नमी रस भरे। बिब सुरंग लाजि वन फरे ॥ फूल दुपहरी जान राता। फल झरह ज्यों ज्यों कहबावा ॥ होरा लेइ सो विद्म धारा। विहँसत जगत होद उजियारा ॥ भए मजीठ मानन्हू रंग लग । कुसुमरंग थिर रहै न भागे । अस के अधर अभी भरि राखे। अवह अछत, न काह चाहे ॥ मुख तवाल रग धाहि रसा। हि मुख जोग जो ग्रत बसा ? ॥ राता जगत देखि रंगराती। रुहिर भरे आदि बिहँसाती ॥ अभी अधर ग्रम राजासब जग आस करे । केहि कह कर्नेल विगासा, को मधुकर रस लेइ । ? ॥ ८ ॥ टसन चौक बैले जन् हीरा नौ विच त्रिव रंग स्याम गंभीरा ॥ जस भादों दि िदामिनि दीरी। चमक उठे तस बना बतीसी । वह अपराहों । हीरा जाति से तेहि परछाहीं । सुजोति हीग जेहि दिन दसनजोति निई बहसें जोति जोति प्रोहि भई । रवि ससि नखत दिपहि मोहि जोनो। रतन पदारथ मानिक मोती S। जजद विहँति सुभाहि सो!। तहूँ तह टिकि जोति परासी ॥ दामिनि दमकि न सरवरि पूज। पुनि मोहि जोति औौर को दूजी ? ॥ हंसत दसन अस उठे भरतिक। । चमके, पाहन दारिॐ सरि जो न रका, फटेड हिया दरक्कि। ॥ है ॥ फिरावहीं = धर देते हैं । (६) मनी = सेना। वनवरि = याणानितोरों प्रा० की प।क्त । सास्त्री = क्ष । साखी = सायगवाही । रन = अरण्य ( र) ७) जोग दे* = जोड । में । पंवारी । (मला समता रख लोहारों का एक औजार जिससे लोहे में छेद करते हैं । हिरका लेइ = पास सटा ले। (८) के होर इ‘‘‘उजियारा = दाँतों को श्वेत श्रर रों को अरुण ज्योति के प्रसार से ज Tस में जाला होता, कह क र कवि ने उपा या दस का बड़ा। सुंदर गूढ़ संकेत रज़ा है ! मजद =हुत गहरा मजीठ के रंग का लाल। ।