पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/२२२

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है
४०
पदमावत

४० जन रसना कहीं जो कह रस बाता। अमृत वैन मन सुनत रता ॥ हर सो सुर चातक कोकिला। बिन बसंत यह वैन न मिला । चातक कोकिल रहए जो नाहीं। सुनि बह बैन लाज षि जाहीं ॥ रे मरस बोला। वूमै सो माति ने के डोला ।। चतृतवेद मत सव ओोहि पाह। रिंग, जजगाम ग्रंथ बन गहाँ ॥ एक एक ोल रथ चगना । इंद्र मोह, वरम्हा सिर धना ॥ अमर, भागवतगीता । अरथ दु2ि पंडित नह जीता पिंगल । भासवती औौ याकरन, गिल पड़े पुरान । बेद भेद सों वान कहसृजनन्ह लागे ॥ १० । वान रनर का सुरंग कपोला । एक नाग दुड़ लिए आगोला ॥ पुहप पंक रस मत सांधे। केढ़ द्र सरैग बाँधे ॥ खरौरा ? कपोल वाएँ तिल परा। जे तिल देख़ि सो तिल तिल जरा ॥ घंघचो मोहि करनहींबिरह हटिल । बान स सामुहीं ॥ गनिनि तिल । एव कटाछ लाख दस सू झा ! बान जानों सूभ सो तिल मेटि । गाल काल जग गाल नहि गएऊशव बह भएऊ ।। देखत नैन परी परिछहों । तेहि में गत साम। । छपराह सो तिल देखि कपोल परगगन रहा ध्रुव गाड़ि । खिनहि उठं खिन बूडे, डोलै नहि तिल हाँईि ॥ ११ ॥ नवन सीप दृइ दीप सँवारे। कुंडल कनक रचे उजियारे मनि कुंडल झलके प्रति लीने। जन कौंधा लौकर्दि दुदिसि चॉद सज चकाहीं । न तन्ह भरे निरखि नहि जाहीं ॥ दुबे ॥ कोने तेदि द्र पर ईंट दीप वारे। इइ धव दृौ ट वैसारे ॥ ग्रे जनी भी कचपचित्रा सीपी । खंभी सिबन्दीपी। खन बिन जवहि कर सिर गहे। काँपति बीज प्री बिसि रहे । ईराह देवलोक सिंघला। टूटि ए क कला । परै न बीज " करह नखत सत्र सेवा स्वन दोन्ह अस दोउ । चाद पर गोहने का कोउ ? ॥ ॥ सुरूज और जगत १२ । धार : धड़ी, । रेस्त्रा । चक = धागे थे, चार दाँत । पाहन = पत्थर, हरा । । झरविक उठे = भलक गए । हो । () अनेक प्रकार के रत्नों के रूप में गए १० 'शमकश । भासवती=भास्वत नामक ज्योतिष का ग्रंथ । नन्ह=सुजानों या चतुरों दो । ) साँवे =। (११, गंध । खुराः =वार्ड के L चुष्चो=गुजा। करघेहा=काले झंहवाला। (१२) लौकहि =चमकती है, दिखाई पड़ती है । खट-कान का एक गहना। ऐंट=वान।

खंभी=कान का एक गहना। कपचियाकृत्तिका नक्षत्र जिसमें बहुत से वार एक में गुच्छ दिखाई पड़ते हैं । गोहने माथ में, सेवा में । (१३) कंधु = प्रख ।