पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/२४४

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(१७) मंडपगमन खंड राजा बाउर विरह वियोगी । वेला सहस तीस सँग जगी । पदमावति के दरसन नासा । दंडवत कोन्ह भंडप चहें पासा 1. पुरुष बार होइ के सिर नावा । नावत सीस देव पद आावा ॥ नमो नमो नारायन देवा। का मैं जोग, करों तोरि सेवा । तू दयाल सब के उपराहीं । सेवा केरि ग्रास तोहि नाहीं ॥ ना मोहि गुन, न जीभ रस बाता। हूँ. दयाल, गुन निरर्न दाता ॥ पुरबहु मोरि दरस के आासा । हौं मारग जोवीं धरि साँसा ॥ तेहि विधि बिनै न जान ज़हि विधि प्रस्तुति तोरि । करहु सुदिस्टि मोहि पर, हींछा पूरे मोरि ॥ १ । के प्रस्तुति जब बहुत मनावा। सबद अकूत भंडप महें आावा ॥ मानुष - पेम भएछ कुठी । नाह त काह, छार भरि मूटी ॥ पेमहि माँह बिरह रस रसा। मैन के घर मध्र अमृत बसा। निसत धाइ जीं मरे त काहा। सत ज करै बैटेिं तेहि लाहा ।। एक बार जो मुन देइ सेवा । सेवह फल प्रसन्न होई देवा ॥ सुनि के सबद मंडप झनकारा। बैठा आाइ पुरुष के बारा ॥ पेंड चढ़इ छार ति माँटी। माटी भएड अंत जो माटी ॥ माटी मोल न किटु , नौ सब मोल । माटी दिस्टि ज माटी साँ करं, माटी होइ अमोल ॥ २ ॥ बैठ सिंघछाला होइ तपा। ‘पदमावति पदमावति .जपा । दीठि समाधि श्रोही स लागी। जेहि दरसन कारन बैरागी ॥ किंगरी गहे बजावें भूरे । भोर साँझ सिंगी निति पूरे ॥ कंथा ज, अगि जन लाई। बिरह धंधार जरत न बुझाई । ॥ नैन रात निसि मारग जागे। चढ़े चकोर जानि ससि लार्ग ।। कुंडल के सीस भुईं लावा । पावर होऊँ जहाँ श्रोहि पावा । जटा छोरि के बार बहारों । जेहि पथ आाव सीस तहें वारी ॥ चारिह चल फिरों में, ठंड न रहीं थिर मार । हो।इ के भसम पौन सेंग (धावों) जहाँ परान प्रधार ॥ ३ ॥ (१) निरगुन = बिना गुणवाले का। (२) आकत = ग्रापसे श्राप, अक स्मात् । मैन = मोम । लाह = लाभ। पिंड = शरीर । ति = जितनी । ऑाँटी = ऑटी; हाथ में समाई। माटी सौं दिस्टि करें। - सम सब कुछ मिट्टी या शरीर मिट्टी में मिलाए । माटी = शरीर । (३) तपा = तपस्वी । (३) = औरै व्यर्थ । धधार = लपट । रात = लाल । जूती पाँवरि = पावा = पैर । बहाॐ = झाड़ लगाऊँ। थिर मार = स्थिर होकर ।