पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/२४६

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पदमावत

६४ पदमावत अब जोबन बारी को राखा । कुंजर विरह बिधंसे साखा ॥ मैं जानेगें जोबन रस भोगू । जोबन कठिन ग्रुताप बियोगू ॥ जोबन गरुम अपेल पहारू। सहि न जाई जोबन कर भारू ।। जोबन आस ममत न कोई । नवं हस्ति जों माँकुस होई ॥ जोबन भर भादौं जस गंगा। लहरें देश, समाइ न अंगा। परिकें अथाह, धाय ! हौं जोबन उदधि गंभीर । तेहि चितवीं चारितु दिसि जो गहि लावें तीर ॥ ३ ॥ तुई समुद सयानी । तोहि सर समुद न पूछे रानी नदी समाहि समुद महें ग्राई। समुद डोलि कह कहाँ समाई ॥ अवहीं कर्नूल की हि तोरा। प्राइहि भौंर जो तो कहें जोरा ॥ जोबन तुरी हाथ गहि लीजिय। जहाँ जाइ तहें जाइ न दीजिय ॥ जोबन जोर मात गज अहै । गहह ज्ञान ग्राँइस जिमि रहै । अबहि बारि तुर्सी पेम न खेला। का जानसि कस होइ दुहेला ॥ गगन दीठि करु नाइ तराहीं । सुरुज देख कर नार्वे नाहीं ! जब लगि पीउ मिलै नहसाध , प्रेम के पीर । जैसे सीप सेवाति कहेंतप समद में नीर ॥ ४ ॥ दहैधाय , ! जोबन एहि जीऊ । जानॐ परा अगिनि महें घीऊ ॥ करेंवत सहीं होत दुइ आाधा। सहिन जाइ जोबन के दाधा ॥ बिरह समुद्र भरा असँभारा। भौंर मेलि जिज लहरिन्ह मारा । ॥ बिहग नाग होइ सिर चढ़ि डसा। होड़ अगिनि चंदन महें बसा जोबन बिरह बियाध। पंखी, केहरि भयउ कुरंगिनि खा कनक पानि कित जोबन कोन्हा । ऑटन कटिन बिरह श्रोहि दोन्हा ॥ जोबन जलहि बिरह मसि था। फूलहि भरफरह भा सूना ॥ जोबन चाँद उग्रा जसबिरह भएउ सँग राह । घटतदि घटत छोन भइकहै न पार्टी काहु ॥ ५ ॥ (मेमंत ३) = मदमत्त । अपेल = न खेलने योग्य । (४) समुद = समुद्र सी, गंभीर। तुरी = घोड़ो । मात = माता हुजा, मतवाला। दुहेला कठिन खेल । गगन दीटिंतराहीं = पहले कह झाए हैं कि भर दीठि मनो लागि प्रकार । (५) दाधा = दाह, जलन । होइ अगिनि चंदन महें बसा = वियोगियों को चंदन से भी ताप होना प्रसिद्ध भएड है। केहरि " खाध = जैसे हिरनी के लिये सिंहवैसे ही यौवन के लिये विह हमालौटन । = पानी का गरम करके खौलाया जाना । मसि = कालिमा सुश्रा को । फलहि भर "= जैसे फल बिगाड़ने वाला भरा औौर फल को नष्ट करनेवाला तोता हुआ वैसे ही यौवन को नष्ट करनेवाला बिरह हश्रा । T