पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/२५६

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७४
पदमावत

७४ पदमावत घरी नाड़ तब गा में सोई। कैसे भुगुति परापति न होई अब ज सूर हौ ससि राता। ग्राए चढ़ि सो गगन पुनि साता ॥ लिखि के वात सखिन सौं कही। इहै ठाँव हों बात रही । त होइ अस भंगू । जगत दिया कर होड़ पतंगू जा सहूँ हीं चख हेगें सोई टाँव जिउ देइ । एहि दुख कतलें न निसरीको हत्या ग्रसि लेइ ? ॥ १३ । कीन्ह पयान सबन्ह रथ हाँका । परबत छाड़ि सिंघलगढ़ ताका । बलि भए सवे देवता बलो । हत्यारिन हत्या लेड चली ॥ को अस हिनू मुएगह बाहीं । जाँ मै जिउ अपने घट नाहीं ॥ जौ लहि जिज नापन सब कोई । वितू जिर कोइ न प्रापन होई। भाइ बंधु औी मोत पियारा। बिनजिउ घरी न रादें पारा ॥ बिनु जितें पिंड छार कर कूरा। छार मिलावै सो हित पूरा ॥ तेहि जिड बि, अब मरि भा राजा। को उठि वैछि गरब सों गाजा ॥ परी कया भु ईं लोटे, कहाँ रे जिउ बलि भीछे । उठाइ बैठारे बाज पियारे जीड । 1 १४ " पदमावति सो , भंदिर पईटी । हंसत सिंघासन जाइ बईटी ॥ निसि सूती सुनि कथा बिहारी। भा बिहान कह सखो फेंकारी ।। देव पूजि जस प्राइडें काली। सपन एक निसि देखिएँआाली ॥ जन ससि उदय पुरुव दिसि लोन्हा। श्री रवि उदय पऊिँ दिसि कीन्हा ॥ चलि सूर चाँद पहें ग्रावा। चाँद सुरुज दुहूँ भएड मेला दिन श्री राति , एका। राम रावन गढ़ । भए जया फेंका तस किछ कहा न जाइ निबधा। रजुन बान राहु गा धा ॥ जन, लंक सब लटो, हनुवं विधंसी बारि । जागि उठिकें अस देखत, सखि ! क३ सपन विचारि॥ १५ ॥ सखी सो बोलो सपन विचारू । काल्हि जो गइटु देव के बारू ॥ पूजि मनाइएं बहत भती। परसन श्राइ भए तुम्ह रात । सूरुज पुरुष चाँद तुम रानी। मत बर दै मेरा, नानी ! पढ़ेि खंड कर राजा कोई । सो मावा बर तुम्ह कहें होई ॥ ठव= अवसरमौका। वारति रहो - बचातो रही। में " = रंग में भंग, उप- द्रव । (१४) ताका = उस ओर बढ़ा । मरिमर , चुका । भr = गयामर बलि भोरें : भोम कहलानेवाले । वगैर बलि औौर बाज बिना, छोड़कर। (१५) बिहार -- विहार या सैर को। मे रावा=मिलन । निधा= वह ऐसी निषिद्ध या बुरी बात है। राहु = रोहू मछलो । राहु गा बेधा = मत्स्यबंध हटा ।