पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/२६०

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७८
पदमावत

७८ अब अस कहाँ छार सिर मेलों ? । छार जो होतें फाग तब खेलीं। कित तप कोन्ह छाँद्धि के राजू । गए अहार न भा सिध काजू ॥ पाएउ नहि होइ जोगी जती । अब सर चढ़ जॐ जस सता ॥ थाइ जो पीतम फिर गा, मिला न माइ बसंत । अब तन होरी घालि , जारि कॐ भसमंत ॥ ६ ॥ ककन पंखि जैस सर साजा । तस सर साजि जरा चह राजा ॥ सकल देवता माइ तुलाने । दर्द का होइ देव प्रसथाने ॥ बिरह अगिनि बचागि ग्रसूझा। जरें सूर न बुझाए बूझा ॥ तेहि के जरत जो उठे बजागो । तीनऊँ लोक जड़े तेहि लागी ॥ अवदि की घरी सो चिनगी है। जरहि पहार पहन सब फूटे ॥ देवता सवे भसम होइ जाहीं । छार समेटे पाउब नाहीं । धरती सरग होइ सब ताता । है कोई एहि राख बिधाता ॥ म हमद चिनगो पेम . कहै, सुनि महि गगन डेराइ । धनि बिरही गौ धनि हिया, त, ऋस अगिनि समाइ ॥ ७ ॥ हनु बृत बीर लंक जेजेइ जारी। परबत उहै अहा रखवारी ॥ बैटिं तहाँ होइ लंका ताका। छठ मास देइ उठि हाँका ॥ तेहि के आागि उहौ पुनि जरा । लंका छाड़ेि पलंका परा ॥ जाइ तहाँ वै कहा देसू । पारबती औौ जहाँ महेसू ॥ जोगी ग्राहि बियोगी कोई। तुम्हरे मंडप यागि तेइ बोई । जन लेंगूर मु राता उहाँ । निकसि जो भागि भएड करमुहाँ !) तेहि बर्लागि जरे हों लागा। बजरअंग जरतहि उठि भागा ॥ रावन लंका हीं दही, वह हीं दाहै आाव । गए पहार सब औौटि के, को राखे गहि पाव ? ॥ ।। ८ । (६) हता = था, माया था । सर = चिता । (७) ककन् (फा ० ककन ) एक पक्षी जिसके संबंध में प्रसिद्ध है कि आायु पूरी होने पर वह घोंसले में बंटकर गाने लगता है जिससे ग्राग लग जाती है और वह जल जाता है । पहन = पाषाण, पत्थर । पलंका = पलंग, चारपाई अथवा लंका के भी आगे ‘प लंकानामक क पित द्वीप ।