पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/२७१

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है
८९
राजा गढ़ छेंका खंड

राजा गढ़ का खंड ८ थे. सदा पिरीतम गाढ़ करेई । श्रोहि न भू लाइ, भूलि जिउ देई ॥ रि सजीवन आानि , श्र श्री मुख मैला नोर । गरुड़ पंख जस झा, अमृत बरसा कीर (१६ । मुना जिया अस बास जो पावा 1 लोन्हस साँस, पेट जिज आवा॥ देखेसि जागि, सुधा सिर नावा। पाती देइ मुख वचन सुनावा । गुरू क बचन नवन दुइ मेला। को न्हि सुदिस्टि, बेगु चलु चेला ।। तोहि मलि कीन्ह आप भइ केवा। हीं पठवा गुरु बीच परेवा ॥ पौन साँस तोसॉ मन लाई। जोवै मारग दिस्टि बिछाई ॥ जस तुम्ह कया कीन्ह अगिदालें। सो सब गुरु कहें भएउ आगाहू ॥ तब उदंत छाला लिखि दीन्हो। बेगि ग्राउज, चाहै सिध कीन्हा ॥ श्रावहु सामि सुलच्छना, जीउ बसे तुम्ह नाँव । नैनहि भीतर पंथ है, हिरदय भीतर ठावें ।२०॥ सुनि पदमावति के असि मया। भा बसंत उपनी नइ कया ॥ सुश्रा क बोल पौन होई लागा। उठा सोड, हनुबृत अस जागा । चाँद मिलै के दिन्हेसि आासा । सहसौ कला सूर परगासा ॥ पाति लीन्हि, लेइ सीस चढ़ावा । दीठि चकोर चंद जस पावा ॥ आास पियासा जो जेहि केरा। ज झिझकार, ओोहि सहें हेरा ॥ अब यह कौन पानि मैं पीया। भा तन पखपतंग मरि जीया ॥ उठा फलि हिरदय न समाना। कंथा टक टक बेहराना ॥ जहाँ पिरीतम ने बसहैि, यह जिउ बलि तेहि बाट ॥ वह जो बोलावे पार्टी स , हों तलें चलीं लिलाट ॥२१॥ जो पथ मिला महेसहि सेई। गएच समुंद औो हि धेसि लेई ॥ जहें वह कुंड विषम भौगाहा। जाइ परा तहें पाब न थाहा ॥ बाउर अंध पेम कर लागू । सौंहें धंसा, किछ सूझ न प्रागू ॥ लीन्हे सिधि साँसा मन मारा। गुरू मदरनाथ सारा । चेला परे न छड़हि पायू। चेला मच्छगुरू जस का ॥ जस चैंसि लीन्ह समुद मरजीया। उघरे नैनबैं। जस दीया खोजि लीन्ह सो सरगदुधाराबच जो दे जाइ उघारा । बाँक चढ़ाव सरग गढ़, चढ़ गए होइ भोर । भइ पुकार गढ़ ऊपर, चड़े सेंधि देइ चोर ।२२ गाढ़ = कठिन अवस्था । (२०) केवा = केतको । अगाहू भएउ = विदित हुमा । उदंत = (सं०) संवाद, वृतांत । छाला = पत्र से सामि = स्वामी। (२१) हनुवंत = हनुमान् के ऐसा बली। झिझकार = झिड़के। सह = सामने। बेहराना फटा । (२२) चैंसि लेई = धंसकर लेने के लिये । लागू = लाग लगन । परे = दूर । बाँक = टढा, चक्करदार । सरगदुआर = दूसरे अर्थ में । दशम द्वार ।