पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/२८९

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रत्नसेन पदमावती विवाह खंड १०७ तुम जानहु आा पिउ साजा। यह सब सिर पर धम धम बाजा। जेते बराती औौ असवारा । आाए सर्वे चलावनहारा ॥ सो मागम हीं देखति झेखी। रहन न आापन देखासखी होइ बियाह पुनि होइहि गवना । गवनब तहाँ बहुरि नहि अवना ॥ अब यह मिलन कहाँ होड़ ? परा विछोहा टि । तैसि गाँठि पिउ जोरब जनम न होइदि टि ॥ ७ ॥ माइ बजावति बैठि बराता। पान, फूलसेंदर सब राता ॥ जहें सोने कर चित्तर सारी। लेइ बत सब तहाँ उतारी । माँझ सिंघासन पाट सवारा। दुलह यानि तहाँ बैसारा कनक खंभ लागें चहें पाँती। मानिक दिया बह दिन रात ॥ भएछ अचल ध्रुव जोगेि पखेरू । फूलि बैटि थिर जैस सुमेरू । आाजु देउ हीं कीन्ह सभागा। जैत दुख कीन्ह नेग सब लागा ॥ था सूर ससि के घर आावा। सि सूहि जनु होइ मेरावा ॥ आाजुइंद्र होइ आाएगें सज बरात कविलास । नाजु मिली मोहि अपछा, पूजी मन के ग्रास ॥ ८ ॥ होड़ लाग जेवनार पसारा। कनकपत्र पसरे पनवारा ॥ सोन थार मनि मानिक जरे। राय रंक के आागे धरे । ॥ न जड़ाऊ खरा खोरी। जन जन भागे दस दस जोरी t। गडुवन हीर पदारथ लागे। देखि बिमोहे पुरप सभागे जानहु नखत कह उजियारा। छप गए दोपक अं मसियारा ॥ गइ मिलि चाँद सुरुज के करा । भा उदोत तैसे । निरमरा जेहि मानुष कहूँ जोति न होती। तेहि भइ जोति देखि बह जोती । पाँत पाँति सब , भाँति भाँति जेवनार । कनकपत्र दोनन्ह तर, कनकपत्र पहिले भात परोसे जाना । जनसँ सुबास कपूर बसाना । माँड़े ग्राए पोई। देखत उजर पाग जस धोई ॥ लुचुई और सोहारी धरी । एक तो ताती सुवुि कोंबी ठंडरा बचका औी । एकतर सौकोहंड़ौरी । डभकौरी बरी , (८) चित्तर सारी = चित्रशाला । जोगि पखेरू =पक्ष के समान एक स्थान पर जमकर न रहनेवाला मानंद से योगी। फूलि=प्रफुल्ल होकर । नेग लागा ) सार्थक होने ( मुहा०हुआा, सफल हुजा, लगा ।(९) पनवार=पत्तल । खोरा = कटारा। मसियार = मशाल । कग = कला । (१० ) झालरएक = - प्रकार का पकवान। एक चपाती । पाग-पागड़ी । , भलरा माँड़े = प्रकार को लुई = मैद की महीन पूरी । सोहारी = पूरी । व मुलायम वंडरा = हए बेसन के भाप चौटे ट कहे या दही में भिगोए फेटे पर पके हुए जो रसे जाते हैं; कतरा रसाज । बचका = बेसन और मैदे को एक में फेंटकर जलेवे के समान टपका घी में छानते हैं, फिर दूध में भिगोकर रख देते हैं । एकोतर सौ एकोत्तर शत, एक सौ एक । कोहंड़ौरी == पेठे की बरी ।