पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/२९६

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पदमावत

११४ बाँक नैन ओ अंजन रेखा । खंजन मनहें सरद ऋतु देखा । जस जस हेर, फेर चख मोरी। लगे सरदभड़ें खंजन जोरी । भौहैं धनुक धनुक पे हारा । नैनन्ह साधि बान विष मारा । करनफूल कानन्ह अति सोभा । ससिमुख माइ सूर ज लोभा । सुरंग "अधर श्री मिला तमोरा । सोहै पान फुल कर जोरा . कुसुमगंधअति सुरंग कपोला। तेहि पर अलक अंगिनि डोला ॥ तिल कपोल अलि कौंल बईटा । बेधा सोइ जेइ वह तिल दीठा ॥ देखि सिगार अनूप बिधि, बिरह चला तब भागि । काल कस्ट इमि ग्रोनवा, सब मोरे जिउ लागि ॥ & ॥ का बरनौ भरन औौ हारा । ससि पहिरे नखतन्ह मारा ॥ चीर चारु श्री चंदन चोला। हीर हार नग लाल अमोला । तेहि झाँपी रोमावलि कारी । नागिनि रूप डरे हत्यारी ॥ कुच कंचुकी सिरीफल उमे । हुलसहि चहहि कंत हिय चुभ ॥ बार्सेन्ह बहुँटा टांड़ सलोनी। डोलत बातें भाव गति लोनी ॥ तरवन्ह कर्बल की जनु वाँधी । वसा लंक जान` दुड़ ग्राधी ॥ छद्रघंट तागा। उठहि तीस रागा कटि कचन चलत चूरा पायल अनवट, पार्यान्ह परहि बियोग । हिये लाइ टुक हम कहें, समदह मानभोग ॥ १० ॥ श्र स बारह सोरह धनि सार्जे । छाज न शौर; मोहि पै छाजे बिनर्वाहि सखी गहरु का की । जेहि जिउ दीन्ह ताहि जिउ दीज ॥ सेंवरि सेज धनि मन भइ संका। ठाढ़ि तेवानि कि कर लंका ॥ अनचिन्ह पिछकापों मन माहाँ । का मैं कहब गहब जी बाहाँ । बारि बैस गइ प्रीति न जानी। तरुनि भई मैमंत भुलानी | जोबन गरब न मैं कि चेता। नेह न जान सादें कि सेता ॥ अब सो कंत जो पूछियह बाता। कस मख होइहि पीत कि राता ।॥ हीं बारी श्री दुलहिनि, पीउ तरुन सह तेज । ना जानों कस होइहि, चढ़त कंत के सेज ॥ ११ ॥ (६) खंजन..देखा = पद्मावती का मुख चंद्र शरद के पूर्ण चंद्र के समान होकर शरद ऋतु का ग्राभास देता है। हेर = ताकती है। धनुक = इंद्रधनुष । ओोनवा = का, पड़ा ! काल कस्ट..लागि = विरह कहता है कि यह कालकष्ट आा पड़ा सब मेरे ही जी के लिये । (१०) मारा = माला। झाँपी ढाँक दिया । उभ = उठे हए । बहंट औौर टांड़ = बाँह पर पहनने के गहने । पायल = पैर का एक गहना । अनवट अँगूठे का एक गहना । समद = मिलोनालिंगन करो । (११) गहर देरबिलंब । सँवरी = स्मरण करके । तैवानि = सोच या चिंता में पड़ गई । अपरिचित। सव=श्याम । पूछिह पूछेगा