पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/३५३

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नागमती-पद्मावती-विवाद खंड १७१. मच्छ कच्छ दादुर कर बासा। वग आस पंखि बसहि तोहि पासा । जे जे पंखि पास तोहि गए । पानी महें सो बिसाईंध भए जौ उजियार चाँद होड़ दा। बदन कलंक डोम लेइ था ॥ मोहि तोहि निसि दिन कर वीनू । राहु के हाथ चाँद के माचू ॥ बार जौ । तौह बिसाईं जाइ न धाई धव काई काह कहीं ओो हि पिय कहूँमोहि सिर धरेसि श्रृंगारि । तेहि के खेल भरोसे, तुइ जीती, मैं हारि 7 तोर अकेल का जीतिएँ हारू। मैं जीतिदें जग कर सिंगारू बदन जितिनें सो ससि उजियारी । नी जितिलें भुगंगिनि कारी ॥ नैनन्ह जितिकें मिरिग के नैना। कंठ जितिई कोकिल के बैना ।। भौंह जितिर्की आरजन धनुधारी। गोउ जिति) तमचूर पुछा ॥ नासिक जितिवें पुहुप तिलसूा । सूक जितिद्वं बेसरि होइ ऊना ॥ दामिनि जितिवें दस दमकीहीं । अधर रंग जोतिईं बिबाहों । केहरि जितिकेंलंक में लीन्हो। जितिद्वं मालचाल वे दोन्ही । पुडुप बास मलयागिरि निरमल अंग बसाइ । न नागिनि प्रासा लुबुध डससि का कहे जाइ1 १० ॥ का तोहि गरब सिंगार पराए । अबहीं लैहीं लूट सब ठाएं । हौं साँवरि नैना चीरबैंना सलोन मोर । सेत , मुख चातक । नासिक खरगफूल व तारा। भौंहें धनुक गगन गा हारा सामा। छ बोज जौ विफंसे बॉंमा। बिद्म अधर रंग रस राते । जूड़ अमिय प्रसरवि नहि ताते । चाल गयद गरब । बसा लंक, नागसर। करो। अति भरी साँवरि जहाँ लोनि सुठिठे नीकी । का सरवरि तू करति । जो फोको पुप कर्बल मोर बास औौ पवन अघारी, तरल। चहीं केस धरि तोर मरन मोर खेल ॥ ११ । नावों, पदमावति सुनि उतर न सही। नागमती नागिनि जिमि गही ॥ वह ओोहि कहेंवह मोहि कहें गहा। काह कहीं तस जाइ न कहा ॥ जोबन गाजें । अछरी जन बार ाज । भा बाह्न बाह्न स जोरा। हिय स हिय, कोइ बाग न मोरा ॥ डोम ग्रा =प्रवाद है कि चंद्रमा डोमों के ऋणी हैं, वे जब घेरते हैं तब ग्रहण होता हैं ।(१९) नासा लुबुध =सुगंध की आाशा से साँप चंदन में लिपटे रहते हैं । ज ड (११) सिंगार पराए - दूसरों में लिया सिंगार जैसा कि ऊपर कहा है । । । आमिय.ताते उन अधरों में बालसूर्य को है पर वे अमृत के समान = ललाई हैं, गरम नहीं । नागेसर को = नागेसर फूल की कलो। तरहेल = नीचे पड़ा हुआा अधीन। (१२) बा=लड़ती बाग न ोरा == बाग नहीं मोड़त, अर्थात् लड़ाई से हटती नहीं ।