पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/३५४

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१७२
पदमावत

१७२ कुच सो कुच भइ स! हैं अनी। नवदि न नाएटूहि तनी कुंभस्थल जिमि गल मैमंता। दूवी श्राइ भिरे चौदेता। देवलोक देखत हुत ठाढ़े लगे बान ॥ । हिय, जाहि न काहू जनसँ दीन्ह ठगलाड , देखि तस मीड ग्राइ । रहा न कोइ धरहरियों क र दुर्दान्ह महें बोर्ड ॥ ॥ १२ पवन नवन राजा के लागा। कहेसि लड़हि पदमिनि औौ नागा ॥ दूनी सवति साम श्री गोरी 1 मराहि तो कह पावस असि जोरी । चलि राजा आावा तेहि बारी। जरत बुझाई दून । नारी एक बार जेइ पिय मन बूझा। सो दुसरे सों काहे क जूझा ? । मस गियान मन भाव न कोई। कबढ़ राति, कबहूँ दिन होई ॥ धप छह दोउ पिय के रंगा। दून मिली रहह एक संगा। । जून छड़ि अब दोऊ। सेवा करह सेव फल होऊ | गंग जमुन तुम नारि दोउ, लिखा हम्मद जोग । सेव करहु मिलि दूनी, तो मानहु सुख भोग 1 १२ ॥ प्रस कहि दूनौ नारि मनाई । बिहंसि दोउ तव कंठ लगाई ॥ लेइ मंदिर महें आाए। सोने पौंग जद रहे बिछाए ॥ दाउ सग सीझी पाँच .त जेवनारा। औी भोजन छप्पन परकारा ॥ हलसीं सरस खजह। खाई। भोग करत बिहँसी। रसनाई ॥ सोन मंदिर नगमति कहें दीन्हा। रूप ॥ मंदिर रतन रतन के खंभा। बैठा। राज जोहा सभा ॥ मंदिर पदमावति लोन्हा सभा सो सबै सुभर मन कहा । सोई अस जो गुरु भल कहा ॥ बहु , बह भोग सुखकुरलहि केलि कराहि । दृह सों केलि नित माने, रहस अगेंद दिन जाहि ॥ १४ ॥ है मनीनोक । तनी = चोली के बंद । चौदेता=स्याम देश का एक प्रकार का हाथी; अथवा थोड़ी अवस्था का उड पशु (वल, घोड़े ग्रादि के लिये इस शब्द का प्रयोग होता है) । ठगलाड़ = ठगों के लड्डू जिन्हें खिलाकर वे मुसाफिरों को =झगड़ा । बीचू कर । बेहोश करते हैं । धरहरिया छुड़ानेवाला = दौनों को अलग करेझगड़ा मिटाए ।