पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/३७३

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बादशाह चढ़ाई खंड १९१ दरब लेइ तो मानों सेव कर्टी गहि पाउ। चाहै जौ सो पदमिनी सिंघलदीपहि जाउ ॥ ३ ॥ बोल न राजा ! आए जनार्ड। लीन्ह देवगिरि और छिताई ॥ सात दीप राज सिर नावह। औौ सेंग चली पदमिनी ग्राहि ॥ जेलूि के सेव करे संसारा। सिंघलदीप लेत कित बारा ? ॥ जिनि जान ियह गढ़ तोहि पाहीं । ताकर सवै तोर किछु नाहीं ॥ जेहि दिन प्राइ गों कहें छकिहैि। सरबस लेइ हाथ को टेकिहि ॥ सीस न छहै खेह के लागे'। सो सिर छार होइ पुनि आगे । सेवा कर जो जियन तोहि भाई । नाहि त फेरि माँख होड़ जाई । जाकर जीवन दीन्ह तेहि, अगमन सीस जोहरि । ते करनी सब जानेकाह पुरुष का नारि॥ ४। तुरुक ! जाइ कहु मरे न धाई। होइहि इसकदर के नाई ॥ सुनि अमृत कदलीबन धावा। हाथ न चढ़ रहा पछितावा औ तेहि दीप पग होइ परा। चूंगिनि पहार पाँव देइ ज़रा ॥ ओं धरती लोह सरग भT । पहुँचत कर ताँबाजीउ दीन्ह लाँवा ॥ यह चितउरगढ़ सोइ पहारूसर । उठे तब होइ अंगारू ।। जो पै इसकदर सरि कीन्ही। समुद लेह नैति जस वें लीन्ही जो छर आने जाई छिताई । तेहैि छर न डर होइ मिताई । महूँ समुशि अस अगमन, सजि राखा ग ढ़ साऊ । कांख्हि होइ जेहि आावनसो चलि नावे था । ५ ॥ सरजा पलटि साह प: श्रावा। देव न भानै बहत मनावा नागि जो जरे आागि से सूझा। जरत है न बुझाए बूझा। ऐसे मथ न नावै देवा। चढ़ सुलेमाँ मानें सुनि के स राता सुलतान । जे से तपे जेठ कर भालू ।। सहस कग रोष असभ। जेहि तेइ जरा ॥ दि िदेखे दिस सेवा !! जाव । (४) घायु जगाई = अपने को बहत बडा प्रकट करके। छिताई = कोई स्त्री (? ) सीस न छड़े ५ =धूल पड़ जाने से न कटा; लागे सिर छोटी। सी बात के लिये प्राण न दे । १. पाटांतर--‘खोस के लागे । खोस = खिसियाहट, रिस क्रोध नाराजगी । (५) के नाई को सी दशा। धरती लोह' ताँबा = उस भाग के पहाड़ की धरती लोहे दढ़ है और के समान । उसकी आज से प्रकाश तर्गवर्ण हो जाता है । जी पे इसकंदर .. कोन्हो = जो तुमने सिकंदर की बराबरी को है तो । छर औौ डर = से । छल अर भय दिखाने () देव (राजा, (ख. सुलेम बादशाह ६= क) राक्षस । = यहदिथों का सुलेमान जिसने देवों औौर परियों को जीतकर वश में कर लिया था । २३