पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/३७४

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पदमावत

१२ पदमावत हिंदु देव काह बर खांचा ? सरगह अब न सूर सर्षो बाचा ॥ एहि जग नागि जो भरि मुख लीन्हा। सो सँग आागि दुहूँ जग कीन्हा ॥ रनथंभउर जग जरि झा, चितउर परे सो आागि । फेरि बुझाए ना। बु, एक दिवस जौ लागि ॥ ६ ॥ लिखा पत्र चारितु दिसि धाए। जावत उमरा बेगि बोलाए ॥ कुंद घाव भा इंद्र सकाना। डोला मेरु सेस अध्लाना । धरती डोलि कमठ खरभरा । भूथन नरंभ समुद्र महें परा । सह बजाइ कढ़ा जग जाना । तीस को भा पहिल पयाना ॥ चितउर सौह बारिगह तानीं । जह लगि सुना कूच सुलतानी ॥ उटिं सरवान गगन लग छाए। जानलू रात मेंघ देखाए ॥ हस्ति घोड़ अऔी दर, पुरुष जावत बेसरा गुट । जहें तहें लीन्ह पलाने कटक, सरह आस छूट I ७ ॥ चल पथ बसर सुलतानी। तीख तुरंग बाँक कनकानी ॥ कारेकुमइतलील, सुपेते । गि, कुरंग, बोजदुर करो! बलक, अरबी, लखीसिजी। चौधर ाल सेंसँ मद भल ताजा ॥ किरमिज, न , जरद, भले । रूपकरान, तलसर। पंचकल्यान, सजाब, बखाने । सहि सायर सब चुनि चुनि आाने ॥ शकी ऑी हिरमिजी, एराकी । तुरकी बहे भोथार बुलाकी । बिखरि चले जो पाँतिहि पाँती। वरन बरन प्रो भाँतिहि भाँती ॥ सिर न पूछ उठाएचहें दिस्सि साँ ऑोनाहि । रोष भरे जस बाउरपवन तुरास उड़ाह ॥ ८ ॥ हस्ती पहिराए । मेघ साम जतु गरजत प्राए मेघहि चाहि अधिक वै कारे । भएड असुभ देखि अंधियारे ॥ , लाहसार बर = क्या हठ है। खाँचा दिखाता रनथंभउर = रणभर का प्रसिद्ध वीर हम्मीर अलाउद्दीन से लड़कर मारा था ७ गया । () द घाव = डके पर चोट । सकाना = डरा। आरंभ = शोर । तानी = दरबार वढ़ा (?)। सरवान =फ्रेडा या तंबू (?) । सूता = सोया हुआ। बारिगह वारगाह, दरबार (?) । बारिगह दर = दल सेना । बेसर खच्चर । पलाने लीन्ह से बात करते . श, टिड्डी। (८) कनकानी = एक प्रकार के घोड़े जो गदहे से कुछ ही बड़े और बड़े कदमबाज होते हैं । १. पाठांतर = गगह ' । कुमइत = कुम्मैत । विंग = सफेद घोड़ा जिसके मुंह पर का पूढ़ा सुम गुलाबीपन लिए हों। कुरंग = कुलंग । = लाखी । सिराजी ऑौर चारों लखी - शीराज के। चौधर = सरपट या पोइयाँ चाल । किरमिज = किरमिजी रंग के । तुरास = वेग । (९) लोहसार = फौलाद । धियार = काले ।