पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/३७८

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१९६
पदमावत

१९६ चलीं कमानें जिन्ह मुख गोला। श्रावहि चली, धरति सब डोला ॥ लागे चक्र बत्र के गुढ़ । चमकहि रथ सोने सब महें ।। तिन्ह पर विषम कमानें धरी । साँचे अष्टधातु के ढरी । सौ सौ मन वै पीयहि दारू। लागह जहाँ सो टूट पहारू ।। मान रहह रथन्ह पर परी सर्वेन्ह महें ते होहि झूठी खरी ॥ जौ लागै संसार न डोलहि होई भुहूँकप जीभ जौ खोलहि ॥ सहस सहस हस्तिन्ह के पाँती । खींचहि रथ, डोलहि नहि माती ॥ नार सब पाटहजहाँ धरह वे पाब । ऊँच खाल बन बीहड़. होत बराबर श्राव 1१८। कहीं सिंगार सि वे नारी दारू पियहि सि मतवारी ॥ उठं नागि जौ छाँहि साँसा धुआंाँ जौ ला जइ प्रकासा । सेंदुर यागि सीस उपरातीं । पहिया तरिवन चमकत जाहीं ! कुच गोला दुइ हिरदय लाए। चंचल घूजा रहह छिटकाए ॥ रसना लूक रहह मुख खोले । लंका जरै सो उनके बोले । मूलक जंजीर बहुत गिंड बाँधे। खींचहि हस्ती, :हि काँधे ॥ बीर सद्भुसाल ॥ सिगार दोउ एक ठाऊँ। गढ़भजन ना तिलक पलीता माथे, दसन बच के बान । जेहि हेरहि तेहि मारहचुरकुस करेह निदान ॥ १६ ॥ जेहि पंथ चली वे आवहैि। जन लावह ॥ जेहि तह तह जर , पागि रहि जो परबत लागि अकासा। बनखंड धिकहि परास के पास ॥ गड गयद जरे भए कारे औी बन मिलिंग रोक न mकारे । कोइलनाग काग ग्र , श्री भंवरा । और जो जरे तिनहि को सँव रा ॥ जरा समुद पानी भा गंवारा। जमना साम भई तेहि झारा । धुमाँ जाम, अंतरिख भए मेघा । गगन साम भा धमाँ जो टेघा ॥ सूरज जो चाँद ओ राहू। धरती जरीलंक भा दाहू ॥ धरती सरग एक भ, तबहु न आग बझाइ । उठ बच जरि डंगवे, धूम रहा जग छाई ॥ २० ॥ (१८) कमानें = तोप । चत्र = पहिए । दारु (क) वारूद; (ख ) शराब।" माती= मतवाली 'दारू शब्द चके हैं इसलिये 1 बराबर = समतल का प्रयोग कर । (१९) कहीं सिंगा."में तोपों को स्त्री के मतवारी = इन पद्यों रूपक में दिखाया । है । तरिवन नाम का कान का साथियों के कंधे टट जाते। हैं । । - ताठक गहना । हि कांधे और बीर सिगार = बीररस ग्रौर गाररस बान=गोले । हराह = ताकती हैं । = तपते हैं । परास के बनहुँखंड =पलास के लाल फूल जो दिखाई देते। हैं वे चुकुस चकनाचूर । (२०) धिकहि । माना बन के तप हए अंश हैं । । = गैडा रो = गंड । नीलगाय । झौंकारे टघा-टहरा, रुका डुगधे = डूगर, पहाड़ । उठे बच जरि’ छाइ = इस बच से (जैसे कि इंद्र के वन से) पहाड़ जल उठे ।