पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/३७९

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


बादशाह चाई खंड १९७ बह आने डोलत सरग पतारा। काँप धरति, न गव भारा ॥ टूटह , परबत मेरु पहरा होइ चकचून उड़हि तेहि झारा। सत खरैंड धरती भइ घटखंडा। ऊपर अष्ट भए बरम्हंडा ।। इंद्र प्राइ तिन्ह खंडन्ह छावा। चढ़ि सब कटक घोड़ दौरावा ॥ जेहि पथ चल ऐरावत हाथी । अबतें सो डगर गगन महें आाथी । औौ जनें जामि रही वह धरी। अब बसें सो हथिंद पूरी गगन छपान खेह तस छाई । सूरज छपा, "नि होझ औई गएछ सिकदर कजरिबनतस होइगा धियार हाथ पसारे न सूदलाग मसियार बर II २१ I। दिनहि रात अचाका। भा अस्त, रथ अस परी रबि चंद्र हाँका । मंदिर जगत दीप परगसे। पंथी चलत बसेरे बसे । । दिन के पंखि चरत उडि भागे । निसि के निसरि चरे सब लागे ।। केवल संकेता’ , कुमुदिनि फूली । चकवा बिछरा, चकई भूली । चला कटक दल ऐस अपूरी। अगिलहि पानी, पछिल धूरी महि उजरी सायर सब सूखा । बनखंड रहेउ न एक रूख! गिरि पहार सब मिलि गे माटी। हस्ति हेराहि तहाँ होड़ चाँटी ॥ जिन्ह घर खेह हेरानेहेरत फिरत सो खेह । श्र ध तो दिस्टि तब आाव, अंजन नैन उरेह ॥ २२ एहि विधि होत पयान सो जावा । प्राइ साह चितउर नियावा राजा राव देख सब चढ़ा। प्राव कटक सब लोह मढ़ा चहें दिसि दिस्ट गजजूहाअस परा । साम घटा मेघन्ह रूहा : ध ऊरध किछ सूझ न जाना चढ़ि वराह" देखी । धन लुइ असें जाकर सुलतानी को” धनि रतनसेन तुरुक कटक अस साजा तुझे राजा। जा कहें ॥ । (२१) चकचून = चकनाचूर । सतखंड“पृथ्वी पर की पटखंडा = इतनी। धूल ऊपर जा जम के स्थान पर उड़कर कि पृथ्वी के सात खंड या स्तर छह ही खंड रह गए औौर ऊपर के लोकों के सात के स्थान पर प्राठ खंड हो। गए । जेहि पथौंपाथी - ऊपर जो लोक बन गए उनपर इंद्र ऐरावत हाथी लेकर चले जिसके चलने का मार्ग ही थाकाशगंगा है । प्राथी ह। हरिवंद पूरी = व लोक जिसमें हरिश्चंद्र गए । मसियार = मशाल । (२२)। अचाका = एकाएक । = । अचानक, फेंकेता संकुचित हुया अपूरी = भ रा हुआ T । अगिलहि पानीधरी २० अगली सेना को तो पानी मिलता है पर को धूल ही मिलती है । उजरी उजड़ी । जिन्ह घर खेह‘खेह जिनके घर धूल में खो गए हैं अर्थात् संसार के मायामोह में जिन्हें परलोक नहीं दिखाई पड़ता उरेह = लगाए। (२३) रूहा चढ़ा सुलतानी = बादशाहत 1 की धनि‘""राजा = या तो राजा तू धन्य है ।