पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/३८०

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पदमावत

ज१८ ढाल केरि परछाहीं । ऐनि होति नावें दिन माहीं अंध कप भा श्रावं, उडत श्राव तस छार । ताल तलावा पोखर धूरि भरी जेवनार । २३ ॥ राज कहा करहु जो करना। भएड प्रसूझ, सू अब मरना ॥ जह लगि राज साज सब होऊ। ततखन भएउ संजोउ जोऊ । बाजे तबल अकत जझाड। व हे कोपि सब राजा राऊ ।। करहि तुखार पवन सौ रीसा कंध , प्रेसवार न दीसा ॥ का बरन अस ऊँच सुखारा। इइपौरी पहुँचे असवारा ॥ बाँधे मोरछाँह सिर संारह । भाँजह पूछ बैंवर जनु दारहि ॥ सज सनाहा, पहूँची, टोपा लोहसार हिरे सब ओोपा तैसे चंवर बनाए, नौ घाले गलतैप । बँधे सेत गलगाह तहें, जो देख सो कंप 1२४| राज तुरंगम बरनों काहा ? । थाने छोरि इंद्र रथ बाहा । ऐस तुरंगम परहि न दीठी। धनि आसवार रहि तिन्ह पीठी ! ॥ जाति बालका समुद थहाए। सेत पूछ जनु mवर बनाए । बरन बरन पाखर अति लोने । जान, चित्र " सँवारे सोने ॥ मानिक जरे सीस श्री काँधे। चंवरलाग चौरासी बाँधे ॥ लागे रतन पदारथ हीरा । बाहन दीन्ह, दीन्ह तिन्ह बीरा ॥ चढ़हि कुंवर मन करहि उछा हूं। ग्रागे घाल गनहि नहि काहू ॥ संदूर सीस चढ़।ए, चंदन खेवरे देह । सो तन कहा लुकाइय, अंत होइ जो खेह ।२५। । गज मैमत बिखरे रजबारा । दीसहि जनहें मेघ प्रति कारा । सेत गचंदपीत श्री राते । हरे साम यू महि मद माते चमकहि दरपन लो सारी । जन् परबत पर पी बारी सिरी मेलि पहिराई सूड़े । देखत कटक पा तर रू दें सोना मेलि के दंत में वारे । गिरिबर टरहि सो उन्ह के टारे परबत उलटि भूमि महें माह । परै जो भीर पत्र अस झारह ॥ प्रस गयद साजे सिघली । मोटी कुरुम पीठि कलमली । वैरख - भडा । परछाहीं = परछाई’ से । जेवनार = लोगों को रसोई में । (२४)

सँजोऊ = तैयारी। अकूत= एकाएक सहसा यूथवा बहत से जभाऊ = युद्ध के । तुखार = घोड़ा। सा = ईष्र्या, बराबरी। पौरी = सीढ़ी के डडे । मोरह = मोरछल । सनाहा = बकतर । पहुँची = बचाने का प्रावरण । पा = चमकते । हैं । गलझप=गले की फूल (ल हे की) । गजगाह=हाथी की भूल । (२५) इंद्ररथ बाहा = इद्र का रथ खींचनेवाले । बालका = टाँगन घोड़े । पाखर = मू ल । चौरासी = गुरुओं का गुच्छा । बाहन दीन्ह“बीरा = जिनको सवारी के लिये वे घोड़ दिए उन्हें लड़ाई का बोड़ा भी दिया । घालि गनहि नहि =कुछ नहीं समझते । सेंट्र= यहाँ रोली समझना चाहिए। खेवरे = खरेखौर लगाए हुए ।