पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/३८४

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पदमावत

२०२ भलेहि चाँद बड़ होइ दिसि पाई । दिन दिनभर सर्दी कौन बड़ाई ॥ मूह जो नखत चंद सैं ग तपे । सूर के दिस्टि गगन महें छपे ॥ के चिता राजा मन बूझा । जो होइ सरग न धरती जूझा ॥ गढ़पति उतरि लड़े नहि धाए । हाथ परे गढ़ हाथ पराए । ट्र पति इंद्र गगन गूढ़ राजा । दिवस न निसर रैनि कर राजा ॥ चंद नि रह नखतन्ह माँझा । सुरुज के सींह न होइ चहै साँझा ॥ देखा चंद भोर भा, सूरज के बड़ भाग। चाँद फिरा भा गढ़ पति, सूर गगन गढ़ लाग ॥ ६ । कटक श्र अलाउदि साही। ग्रावत कोइ न सँभागे ताही ॥ सू उद सद जस लहरें देखी। नयन देख मख जाइ न लेखो। केले तजाचितउर के घाटो केते बजावत मिलि गए माटी केसेन्ह नितह देइ नव साजा कबहूं न साज घटे तस राजा ॥ लाख दुइ लाखा । फरे जाहि त्राहि झएं ॥ उपने नव साज जो श्रावै गढ़ लारों सोई। थिर होइ रहै न पावे कोई ॥ उमरा मीर रहै तह ताई। बाँटि सबहीं ग्रलंग पाई ॥ लाग कटक चारिह दिसि, गढ़हि परा अगिदाह । सुरु गहन भा चाहै, चाँदहिं भा जस राहु । " अथवा दिवससूर भा बासा। परी रैनि, ससि उवा ग्रकासा ॥ चाँद छत्र देड" बैठा आाई । चलें दिसि नखत टिकाई दोन्ह ।। नत प्रकासहि चढ़ दिपाहीं । टटि टि लू क पहन आहा। परहि सिला जस प० बजागी। यहन पाहन सौ उचि जाए ॥ गोला परहि, को ढरकाहीं व र चारिउ दिसि जाहीं ॥ । करत श्रोई घटा बरस 'झरि लाई। ोला , परहि टपकहैिविछाई तुरुक न मुख फेरह गढ़ लागे । एक मर, | दूसर होड ागे दिनांबड़ाई = दिन में सूर्य के सामने उसकी क्या बड़ाई है प्रतापयुक्त थे । जो होइ से रग-"ज वे नीचे नहीं करता= गढ़ ( झा = जो स्वर्ग (गढ़ ) पर हो वह उतरकर य द्ध । हाथ पर गढ़ भा के किले “सामने । ( गढ़ ति में हो गया थत् लू ट हो लाय में मुहा०) । उदधि समुद्र = का समुद्र । केरोन्हसाजा = न सूर्य के नहीं भाया ७ ) पान नए भरती होते जाते हैं) नए नए सामान देता है । = एस जाने कितनों को (जो तस राजा बड़ा राजा वह लाउदान हैं । लंगे। बा, सेना का एक के पक्ष गिदाह अग्निदाह । सुरूज गहन "सूर्य शाह) चंद्र मा राहु = (बाद (राजा) के लिये हण रू हुा चाहा है, वह चंदूम () के लिये राहु रूप गया राजाहो है । ) भभा वासा = ने टिकान हटा । (८डेरे में नखत = राजा के सामंत ौर सैनिक । लूक = अग्नि के समान बाण । उठ - उठती हैं । कोल्हु’ = कोल्ह तुरकाहों । नुढ़ क़ाए जाते हैं ।