पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/३९१

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राजा बादशाह मेल खड २० सरजें सपय कीन्ह छल बैनहि मीठे मीठ । राजा कर मन माना, माना तुरत बसीठ ॥ ५ ॥ हंस कनक पींजर टुत आाना। औौ अमृत नग परस पखाना ।। सोनहार सोन के डांड़ी। सादूल रूप के कड़ी सो बसीठ सरजा लेइ आावा। बादसाह कहूँ शानि मेवारा ॥ ए जगसूर भूमि उजियारे। बिनती करह काग मसि कारे ।। बड़ परताप तौर जग तपा। नवी खंड तोहि को नहि छपा है। कोह छोह दून तोहि पाह मास धूपजियावसि छाहाँ जो मन सूर चाँद साँ रूसा। गहन गरासा, मंजू । परा सा भोर होइ जी ला उठहि रोर के काग । मसि छठे सव रैनि , कागहि केर भाग करि बिनतो अज्ञा अस पाई। "कागह के मसि आापुहि लाई । पहिलेहि धनप नवे जब लागे। काग न टिकै, देखि सर भागे । सर सौहैं होहीं । देखें धनुक चलह फिर त्योंहीं तिन्है काग के कौन जो मुख देइ बसोठी। फेरि चलहि पीटी ।। जो सर सौंह होहि संग्रामा। कित बग होहि सेत वै सामा ? । करै न यापन ऊजर केसा। फिरि फिरि कहै परार फंदेसा । काग नाग ए चुनौ बाँके । अपने चलत साम वे अके ॥ वह छल = छल से । बसट संदेस मान लिया माना= सुलह का । (६) सोनहार = समुद्र का पक्षी । डाँड़ी = अड्डा । काँड़ी = पिंजरा (?) । बिनती करहि काग मसि = कौए विनती करते उनकी दोष, प्रवगुण कारे है सूर्य !`हैं कि कालिमा () दूर कर दे अर्थात् राजा के दोष क्षमा कर। कोह = क्रोध । छोढ = दया, अ परा ग्रह । धूप = धूप से । छाहाँ = छाँह में, अपनी छाया में । मंजूसा = झावे में पड़ गया अत् िघिर गया। कागहि केर अभाग कौए का हो भाग्य है कि उसको कालिमा न टी । (७) कागह के मसि.लाई = कौवे को स्याही तुम्हीं ने लगा ली है। (छल करके', वे कौए नहीं हैं क्योंकि, । पहिलेहि.भारी = जो कौवा होता है वह ज्योंहीं धनुष खींचा जाता है, .= वे अब भाग जाता है । अबm.होही तो भो यदि उनके सामने बाण किया जाय तो तुरत लड़ने के लिये फिर पड़ेंगे। धनुक क) युद्ध के लिये चढ़ी कमान(ख) टेपनकुटिलता सर (क शरतीरख, सरोवर । जो सर..सामा = जो लाड़ई ) , , () तालमें तोर करें न के सामने ग्राते हैं वे श्वेत बगले काले (कौए) कैसे हो सकते हैं ? छापन को तरह देसा = तू अपने को शुद्ध और उज्वल नहीं करता; केवल कौवों इधर का उधर फंदेसा कहता है (कवि लोग नायिकाओं का कौए से स देसा कहना वर्णन करते हैं) अपने चलत.ग्राँके = वे एक बात पर दृढ़ रहते हैं और सदा वहों = कालिमा ही प्रकट करते हैं, पर तू अपने को और का नौर प्रकट करके छल करता श