पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/३९२

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है
२१०
पदमावत

२१ पदमावत कैसेहु जाड़ न मेटा भएउ साम तिन्ह अंग । सहस बार जौ धोवा तबहूँ न गा वह रंग ॥ ७ ॥ अब सेवा जो प्राइ जोहारे । अबऐं देख सेत की कारे ॥ कहीं जाइ जौ साँच, न डरना । जहाँ सरन नाहि त, मरना ॥ काल्हि आव गढ़ ऊपर भानू । जो रे धनुक, सौंह होइ बानू ।। पान बसीठ मया करि पाव। लीन्ह पान, राजा पद आावा ॥ जस हम भेंट कीन्ह गा कोह। सेवा माँझ प्रीति औो छोटू ॥ काल्हि साह गढ़ दे मावाँ । सेवा करह जैस मन भावा ॥ गुन सौं चले जो बोहित बोझा । जहँवाँ धनुक बान तहूँ सोझा ॥ भा आायणु ग्रंस राजधरबेगि दे करह रसोड । ऐस सुरस रस मेरवहजेहि सौं प्रीति रस होड़ में ८ । - ०: (८) अब सेवाजोहारे =उन्होंने मेल कर लिया है तू अब भी देख सकता है कि श्वेत हैं या काले अर्थात् वे छल नहीं करेंगे । जो रे धनुक..बानू = जो अत्र वह किले में मेरे जाने पर किसी प्रकार की कुटिलता क रेगा तो उसके सामने फिर बाण होगा (धनुष टेढ़ा होता है और बाण सीधा) गुन = गूनरस्सी । जहँव घनुक.सोझा = जहाँ कुटिलता हुई कि सामने सीधा है । बाण तैयार