पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/३९४

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२१२
पदमावत

२१२ पदमावत देखत गोद्भ कर हिय फाटा । आने तहाँ होव जद नाटा | तब पीसे" जब पहिले धोए । कपरछानि माँड़े, भल पोए ॥ चढ़ी कराही पावहि पूरी । मुखमहें प्ररत होहि सो चूरी ॥ जानते तपत सेत औ उर्जरी। मैंने चाहि अधिक वे कोंवरी ॥ मुख मेलत खन जाहि बिलाई। सहस सवाद सो पाब जो खाई । ॥ लुचुई पोड पोइ घिछ मेई। पाछे छानि खाँड़ रस मेई ॥ पूरि सोहारी कर घिउ चूमा। श्रत बिलाइ, डरन्ह को छूआ ? ॥ कहि न जाहि मिठाईकहत सी सुठि बात। खात आघात न कोईहियरा जात सेरात ॥ ३ ॥ चढ़े जो चाउर वरनि न जाहीं । बरन बरन सब सुध बसाहीं । रायभोग औौ काजर रानी। झिनवा, रुदवा, दाउदखानी ॥ बासमती, कजी, रतनारी। मधकर, ढेला, झीनासारी ॥ श्री कुंवरबिलासू । रामबास थावे प्रति बासू ॥ लगचू र लाची आति बाँके। सोनखरीका के कपुरा पाके ॥ कोरस्हन, बड़हन, जड़हन मिला। औौ संसारतिलक लड़बिला ॥ धनिया देवल और मजाना। कहें लगि बरनों जावत धाना ॥ सोचे सइस बरन, अस, सूध बासना टि । मधुकर पुरूप जो बन रहे, आाइ परे सब दृष्टि ॥ ४ । निरमल माँस अनूप बघारा । तेहि के अब बरनाँ " परकारा ॥ कटवा, बटवा मिला। स्वासू । सीझा अनबन भाँति गरासू ॥ बहुतें सोचें घिछ महें तरे । कस्तूरी केसर सर्वे भरे । सेंधा लोन परा सब हाँड़ी । काटने कंदर के प्रॉड़ी ॥ सोया सॉफ उतारे घना। तिन्ह में अधिक आाव बासना ॥ पानि उतारह ताकहि ताका। घीउ परेह माहि सब पाका । औौ लीन्हें माँसुन्ह के खंडा । लागे चुरै सो बड़ बड़ हंडा । नागर समूची, धरी सरागन्ह जि जो ग्रस जैवन , उठे सिंघ अस गुंजि ॥ ५ ॥ (३) तपत=जलती हुईगरम गरम । नैन् = नवनीत, मक्खन । कोंवरी = कोमल ।बिड मेई = घी का मोयन दी हुई । कहत मीट.बात = उनके नाम लेने से मुंह मीठा हो जाता है । (४) काजर रानी - रानी काजल नाम का। चावल । रायभोग, झिनवा, रुदवादादखानी, बासमती कजी, मधुकरठेला, भीनासारीघिउकाँदो, कुंवर विलाम, रामबास, लौंगचूर, लाची, सोनखरिका, कपूरी, संसरतिलक, खडबिला, धनिया, देवल चावलों के नाम । पुहुप= पला पर | (५) कटुवा = खंड खंड कटा हुजा । ब आा = सिल पर बटा या पिसा हुआाअनबन = विविध. अनेक। रामू = ग्रंसकौर । तरेतले हुए । श्राँड़ी = , गाँठ । तावहि ताव=ताव देखते हैं । परेह = रसा, शोरबा । सरागन्ह = सिखचों परशलाकाों पर। जि उठे = गरज उठे ।