पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/३९९

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


चित्तौरगढ़ वर्णन खंड २१७ पाँसासारि कुंवर सब खेलहि, गीतन्ह सवन ओोनाहि चेन चाव देखा, जन गढ़ लूका नाहि ॥ ३ देखत साह कीन्ह तहें फेरा । जहें मंदिर पदमावति केरा कनक सँवारि नगन्ह सब जरा। गगन चंद जनु नखतन्ह भरा सरवर चहें दिसि पुरइन फूली । देखत वारि रहा मन भूली कुंवरि सहसदस बार प्रगोरे। दुहें दिसि पवैरि ठाढ़ि कर जोर सारचूल दुहें दिसि गढ़ि काढ़े । गलगाजह जानते ते ठाढ़े जावत कहिए चित्र कटाऊ । तावत पवरिन्ह बने जड़ाऊ साह मंदिर अस देखा, जन कैलास अप धौराहर, सो रानी केहि रूप नाँघत फंवर गए खंड साता। सतएँ भूमि बिछावन राता ऑाँगन साह ठाढ़ भा आई । भंदिर छह अति सीतल पाई पास फुलवारी बारी । माँ सिंहासन धरा सँवारी जन बसंत फूला सब सोने । फल फल बिगति अति लोने जहाँ जो ठाँव दिस्टि महें मावा । दर न भाव दरस देखरावा राखा सुलतानी । बैठ साहमन जहाँ सो रानी करौल सुभाय सूर सर्षा सा। सूर क मन चाँदहि पहें बसा सो पे जाने नयन रस, हिरदय प्रेम ‘र चंद जो बसें चकोर चित, नयनहि आाव न सूर ॥ ५ रानी उपराहीं । करें दिस्टि नहि तहाँ तराहीं सखी सखीं साथ बईो। तपे , ससि नाब न दी। राजा सेव कर कर जोरे । आजु साह घर धावा मोरे नष्ट नाटक, पातुरि औौ बाजा 1 माइ अखाड़ माँह सब साजा पेम क लुबुध बहिर औौ अंधा। नाच कूद जानते सब धंधा न चावै कोई । जो नाचत सो गट न होई परगट कह राजा सौं बाता । गुपुत प्रेम पदमावति राता चोपड़ मोनाहि = झुके या लगे (४) पुरइन = (० पुटकिनी) कमल अगोरे = रखवाली या सेवा में खड़ी हैं । सारदूल = सिंह गलगाजहि = गरजते हैं। कटाऊ = कटाव, वेलबूटे । (५) रता लाल । दरपन भाव.देखराबा दर्पण के समान ऐसा साफ झकाझक है कि प्रतिबिंब दिखाई पड़ता अंकूर = अंकुर । नयनहि न नाव नजर में नहीं जंचता (६) उपराही = ऊपर। सूर = सूर्य के समान बादशाह । ससि = चंद्रमा के समान राजा ससि.दीठि = सूर्य के सामने चंद्रमा (राजा) की ओर नजर नहीं जाती है। अखाड़ = अखाड़ा, रंगभूमि; जैसे-इद्र का अखाड़ा । जान सब धंधा मानो नाच कूद तो संसार का काम ही है यह समझकर उस ओर ध्यान नहीं देता है । कह = कहता है।