पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४०४

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२२२
पदमावत

२२२ पदमावत घोड़ा देख फरजीर्बाद लावा । जेहि मोहरा रुख चहै सो पावा ॥ राजा पील देइ शह माँगा। शह देइ चाह मर रथ खाँगा । । पीलहि पील देखावा भए दु चौदात। राजा चहै बर्द भा, शाह चहै शह मात १६ सूर देख जो तरई दासी । जह ससि तहाँ जाइ परगासी ॥ सुना जो हम दिल्ली सुलता। देखा नाजु त6 जस भानू ।। ऊँच छन जाकर जग माहाँ। जग जो छाँह सब श्रोहि के छाहाँ ॥ बैठि सिंघासन गरबहि जा । एक छह चारिउ खंड भू जा ॥ निखि न जाइ सह मोहि पाँहीं। सर्वे नवहि करि दिस्टि तफहीं है। मनि माथे, मोहि रूप न दूजा । सब रुपर्वत कांह मोहि पूजा ॥ हम प्रस कसा कसौटी झारस । तहें देख कस कंचनपारस ॥ बादसाह दिल्ली कर, कित चितउर महें आाव । देखि लेह पदमावति ! जेहि न रह पछिताव 1१७। बिग: कुमुद कहे ससि टाऊँ। बिगसे कवैल सुने रवि नाऊँ। भछ निसि, ससि चौराहर चढ़ी । सोरह कला जैस विधि गढ़ी । बिहंसि भरोखे प्राइ सरेखी। निखि साह दरपन महें देखी । होतहि दरस परस भा लोना। धरती सरग भएड सब सोना ॥ रुख मगन रुख ता सह भए३। भा शह मातखेल मिट गए। राजT भेद न जाने भौंपा। भा विसँभार, पवन बिनु कपा॥ राघव कहा कि लागि सपा । ले इ पौंढ़ावद सेज सँवारी ॥ फारस अरब की ओोर गया तब वहाँ 'रथके स्थान पर ऊंटहो गया) । बुर्द = खेल में वह अवस्था जिसमें किसी पक्ष में सब मोहरे मारे जाते हैं, केवल बादशाह बच रहता है, वह ग्राधी हार मानी जाती है । शह = मत पूरी हार। (१७) सूर देखतई दोसी = दासी रूप न त्रों ने जब सूर्य रूप बादशाह को देखा । जहें ससिरग।सी = जहाँ चंद्र रूप पदमावती थी वहाँ जाकर कहा । परगासी = प्रगट , वहा । भूजा = भोग करता है । पारस = भाद श, दर्पण : कसा कसी ग्रारस = दर्पा में देखखपर परीक्षा की । कि न व = फिर ाँ जाता है, अर्थात् न जाएग। । (१८) कहे ससि ठा = इस जगह चद्रमा है, यह कहने से । सुने = सुनने से । भा परस लोना = पारस या स्प शमणि का स्पर्म सा हो गT ॥ = शतरंज का रुख । रुख रुख = सागना। भा शह Iत = (क) शतरंज में पूरी हार हुई : (स्व ) बादशाह बेसुध या मतभभा हो । । १ा = छिपा, गुरत । भग वि सँभर . बादशाह बेसुध हो गया । लागि गोपारी = सुपारी के टुकडे निगलने में छाती में रूक जाने से कभी कभी एकबारगी पीड़ा होने लगती है। जिससे ग्रादमी बेचैन हो जाता है, इसी को सुपारी लगना कहते हैं ? देखें = जो उटकर देखता है तो ।