पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४१५

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देवपाल दूती खंड २३३ बिसि जो जोवन कुमुदिनि कंवल न बिगसा, संपुट रहा । कहा। ए कुमुदिनि ! जोबन तेहि माहा। जो श्रा पिउ के सुख चाहाँ ॥ जाकर छत्र सो बाहर छावा। सो उजार घर कौन वसावा : । अहा न राजा रतन अंजोरा। केहिक सिंघासन, केहिक पटोरा ? ॥ को पालक पौढ़े ,को माढ़ो ? । सोवनहार परा वैदि गाढ़ी । च, दिसि यह घर भा गधियारा। सब सिगार लेइ साथ सिधारा ॥ कया वे लि तब जानों जामी। सींचनहार छाब घर स्वामी । ती लहि रहीं झरानो, जौ लहि ग्राब सो कंत । एहि फूलएहि मदुर, नव होइ उठं बसंत 1 ई ॥ जिनि तुइबारि ! करसि आस जी । जौ लहि जोबन तौ लहि पोऊ : पुप संग पन केहि केरा। एक कोहाँइ, दूसर सटू हे । जोबन जल दिन दिन जस टा। भंवर पछान, हंस परगट । सुभर सरोवर जौ लहि नोरा। व श्रादर, पंखी वह तीरा ॥ नौर घटे पुनि पूछ न कोई । विरसि जो लोज हाथ रह सोई ॥ जौ लगि कालिदी, हहिं विरासी । पुनि सुरसरि होइ समुद परासी ॥ जोबन भवंर, फूल तन तोरा। विरिध छुचि जस हाथ मरोरा । कस्म जो जोबन कारनै, गोपोतिन्ह के साथ । छरि के जाइहि बानपेधनुक , रहै तोरे हाथ ॥ १० । जो पिछ रतनसेन मोर राजा । विनु पिउ जोवन कौने काजा । जौ पै जिउ ती जोबन भला। आपन जस करे निरमला । कुल कर पुरुष सिंघ नहि खेरा। तेहि पर केस सियार बसेरा ? ॥ । (६ ) गोंजोरा = प्रकाशवाला । माढ़ी = मंच, मचिया। बँदि = दी है । एहि फूल = इसी फूल से । (१०) कोहांइ= रूटती है । । हूं = स।मने । भंवर (क) पानी का भंवर; (यु) भौरे के समान काले छपान..परगटT = पानी का भंवर गया और हंस नाया (जल की बरसाती बाढ़ ट जाने पर शत् में हंस आ जाते हैं) काले केश न रह गएसफेद बाल हुए । बिरसि जो लीज = जो बिलस लीजिएजो विलास कर लीजिए। जी लगि का निदी. परासी - जब तक कालिंदी या जमना है विलास कर ले फिर तो गंगा में मिलकर गंगा होकरसमुद्र में दौड़कर जान। ही पड़ेगा, अर्थात् जबतक काले बालों का यौवन है तबतक विलास कर ले फिर तो सफेद बालोवाला ढ़ापा आावेगा और मृत्यु को ओोर अटपट ले जायगा। बिरसी = बिलासो। = तू भागतो है अथात् परासा । भागेगी। (१०) जोबन Jवरतोरा = इस समय जोबनरूपी भौरा (काले केश) है औौर फूल सा तेरा शरीर है । विधि = वृद्धावस्था । हाथ मरा = इस फूल को हाथ से भल देगा ान = (क) तोर, (ख ) बर्गकांति । धनुक = टेढ़ी कमर । (११) यापन जैस = आपने ऐसा । खेरा = घर, बस्ती। थर = स्थल, जगह।