पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४४८

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२६६
अखरावट

२६६ अखरावट दोहा रकत मासि भरि, पूरि हियपांच भूत के संग। पए देस तेहि ऊपर, बाज रूप ऑों रंग । सोरठा रहट न दुइ महें बीजू, बालक जैसे गरभ महूँ । जग लेइ नाई , मुहमद रोएड बिछुरि के ॥ ५ ॥ उॐई कीन्हेउ पिंड उहा । मइ मंजूत मादम के देहा भझ ग्रायड यह जग भा दूजा । सब मिलि नबहूकरह एfह पूजा ॥ परगट सुना सबदसिर व। नारद कहें विवि गुपुत देखावा । तू सेवक है मोर निनारा । दसई पंवरि होर्सि रखवारा ॥ भेड़ प्रायमुजब वह सुनि पावा । उठा गरब के सी नवावा ॥ धरिमिहि धरि पापी जेइ कीन्हा । लाइ संग शादम के दोन्हा : उठि नारद जिउ माइ सेंवारा। आइ छींक, उठ दीन्ह केवारा ॥ . बाज आर विना, बगैर । रहउ न दुई‘कहें = आदम जबतक स्वर्ग में था । तबतक वह ईश्वर से भिन्न न था। वैसे ही था जैसे माता के गर्भ में बच्चा रहता है (६) उई = अत् स्वर्ग में भइ= संयुक्त वहीं । संजूतहुई, बनी। भइ = ईश्वर ने प्रायस कहा । जग दूजा में जगत् के अ यह भा ने संसार यह रूप ही दूसरा जगत् उत्पन्न हुया (जो ब्रह्मांड में ) । है वही मनुष्य पिंड में है सव मिलि नवह। = मुसलमानी धर्मपुस्तक में , ईवर आदम_ लिखा हैने को बनाकर फरिश्तों से सजदा करने (सिर नवाने) को कहा, सिजदा । पर शैतान ने न किया इससे वह स्वर्ग से निकाला गया ! विधि = ईश्वर न। सबने किया गुप्त = ठ ह का । मृपंवरि ग्रात्मा या गुप्त स्थान नौवे को इंडलिनो से लेकर अकमल से होती हुई ब्रह्मरंध्र तक चली गई है। दसई = सुषुम्ना नाड़ी नाभि के यही गत मार्ग य। द्वार है जिससे ब्रह्म तक वति पहुँचकर लोन हो सकती है । खैरिमिहिकीन्हा = जिस नारद ने मनुष्य को धर्म मार्ग से बहकाकर पापी कर दिया (यहाँ कवि ने योग के अंतराय या विध्न की कल्पना प्रौर शैतान को कल्पना का प्रभुत मिश्रण किया है । शैतान के लिये यहाँ नारद श द लाया गया है। । नारद पुराणों में भगवान के सबसे बड़े भक्त कह गए हैं । वे इधर उधर लगानेवाले माने जाते हैं। भत शैतान को । झडा भो । सामी ईश्वर का प्रतिद्वंद्वो मानते हैं, पर सृफो ईश्वर का प्रतिद्वंद्वो असंभव मानते हैं, वे शैतान को भझे ईश्वर का भक्त या से ही मानते हैं, जो ईश्वर के नादश से हो भक्तों और साधकों को कठिन परीक्षा किया करता है। द्वारा डो ईश्वर को सेवा करता है । वैष्णव भक्तिभाग में भी शत्रभाव से भजने- वह विरोध वाले स्वोकार किए गए । रावणकंस नादि को गणना ऐसे ही भक्तों में है) । हैं।