पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४६७

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


अखरावट २८५ अस जाने है। सव महें श्री सब भावहि सोइ । ीं कोहाँ कर माटी, जो चाहै सो हो । सोरट सिद्ध पदारथ तीनि, बुद्धि पानें औ सिर, कया । पुनि लेइ हि सब होनि, मुहद तब पकिताब मैं 1 ३७ ॥ सा साहस जाकर जग पूरी। सो पावा वह अमृत मूरी ॥ कहीं मंत्र जो आापनि पौंजी। खोल केवारा ताला जी। साटि’ बरिस जो लपई गई। इन एक गुपुत जाप जो जपई ॥ जानतें दुौ बराबर सेवा । ऐसन चले सहमदी खवा ॥ करनी करें जो पू आासा । सँवरे नादें जो लेइ लेइ साँसा ॥ काटी धंसत उठे जस आाग। दरसन देखि उठे तस जागी । जस सरवर महूँ पंकज देखा। हिय के अखि दरस सब लेखा ।॥ जासु कथा दरपन के , देख श्राप म “ह थाप । चापुहि आा जाइ गिलु, जनहि घुनि न पाप ॥ , मनुवाँ चंचल ढाँप, बरक़ अहथिर ना रहै । साप, मुहमद तेहि विधि राखिए ॥ ३८ हा हिय ऐसन बरजे रह । चूड़ न जाई, बुड़ अति महई ॥ सोइ हिरदय कके सीढ़ी चढ़ई । जमि लोहार ने दरपन गई ॥ चिनगि जोति करसी में भागे। परम तंत परचा लागे । पाँच दूत लोहा गति तावै । दुहें साँस भाटो सुलगावै ॥ कया ताई के खरतर' करई । प्रेम के पेंड़सी पोढ़ के धरई ॥ हनि हथेव हि दरसन सा । खोलनो जाप हिये तन मर्ज ॥ (३८) लघई झपई = पचे, हैरान हो । सा िबरिस.ज जपई = साठ बरस अनेक यत्न करके हैरान होना अंर एक क्षण भर गुप्त मंत्र का जाप करना दोनों बराबर हैं । महमदी खेवा = महम्मद का मत या मार्ग । काटो = लकड़ो । वैसत = घिसते हुए । मनुवाँ = मन । ग्रहथिर = स्थिर । (२६) जिमि लोहार...गढ़ई = जैसे लोहार घन की चोट मार मारकर दरपन गढ़ता है (पुराने समय में लोहे को खूब मज़ औौर चमकाकर दर्पण बनाए जाते थे, बिहारी ने जो दरपन का मोरचा ' कहा है वह लोहे के दर्पण के संबंध में है। चिनगि-भागे = उपले की राख में चिनगारी नहीं रह सकती । परम तंतु = मूल मंत्र से । लोहा गति = लोहे के समान । खरतर = खूब ख रा या लाल । १. पाठ ‘केकरि दर’ है, जिसका कुछ अर्थ नहीं लगता । पोढ़ के = मजबूती से । हनि = मारकर। हथेव = हथौड़ा ।