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पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४७१

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अखरावट

२८९

चेले समुझि गुरू सों पूँछा । देखहुँ निरखि भरा औ छूछा ॥
दुहूँ रूप है एक अकेला । औ अनबन परकार सो खेला ॥
औ भा चहै दुवौ मिलि एका । को सिख देइ काहि, को टेका ॥
कैसे आपु बीच सो मेटै ? । कैसे आप हेराइ सो भेंटै ? ॥
जौ लहि आपु न जीवत मरई । हँसै दूरि सों बात न करई ॥
तेहि कर रूप बदन सब देखैं । उठै घरी महँ भाँति बिसेखैं ॥

दोहा


सो तौ आपु हेरान है, तन मन जीवन खोइ ।
चेला पूछै गुरु कहैं, तेहि कस अगरे होइ ? ॥

सोरठा


मन अहथिर कै टेकु, दूसर कहना छाँड़ि दे ।
आदि अंत जो एक, मुहमद कहु, दूसर कहाँ ॥ ४५ ॥

सुनु चेला ! उत्तर गुरु कहई । एक होइ सो लाखन लहई ॥
अहथिर कै जो पिंडा छाड़ै । औ लेइकै धरतो महँ गाड़ै ॥
काह कहौं जस तू परछाहीं । जौ पै किछु आपन बस नाहीं ॥
जो बाहर सो अंत समाना । सो जानै जो ओहि पहचाना ॥
तू हेरै भीतर सों मिता । सोइ करै जेहि लहै न चिंता ॥
अस मन बूझि छाँड़ु, को तोरा ? । होहु समान, करहु मति 'मोरा' ॥
दुइ हुँत चलै न राज न रैयत । तब वेइ सीख जो होइ मग ऐयत ॥

दोहा


अस मन बूझहु अब तुम, करता है सो एक ।
सोइ सूरत सोइ मूरत, सुनै गुरु सों टेक ॥


धियानी = योग साधनेवाले । चेले = चेले ने । देखहुँनिरखि...छूछा = इस संसार में ईश्वर को व्याप्त देखता भी हूँ नहीं भी देखता हूँ । अनबन = अनेक, नाना । को टेका = कौन वह शिक्षा ग्रहण करता है ? बीच = अंतर (ईश्वर और जीव के बीच का) । हँसै = वह प्रियतम ईश्वर हँसता है । तेहि कर रूप... बिसेखै = कभी तो वह सब को उसी रूप का देखता है और फिर वही दूसरे क्षण में (व्यवहार में) भिन्न भिन्न रूप और प्रकार निदिष्ट करता है । तेहि अगरे = उसके सामने । (४६) लाखन लहई = लाखों रूप धारण करता है । अहथिर कै = जीवात्मा को स्थिर करके । जौ पै किछु...नाहीं = जो वास्तव में कुछ है वह अपने वश के बाहर है, अर्थात् वस्तुसत्ता तक हमारी पहुँच नहीं । चिंता = सांसारिक चिंता । छाँड़ु = सब को छोड़ दे । को तोरा = तेरा कौन है ? समान = समदर्शी । करहु मति 'मोरा' = 'मेरा मेरा' मत कर । हुँत = से । तब वेइ...ऐयत = वे ही सीखते हैं जो सच्चे मार्ग पर आ जाते हैं ।