पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४७७

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आखिरी कलाम २५ भग श्रौतार मोर न सदी । तीस बरिस ऊपर कवि बदी । श्रावत उधत चार विधि ठानr। भा भूकंप जगत अकुलाना ॥ धरती दोन्ह बिधि लाई। फिरे के चक्र अकास रहट क नाइ । गिरि ’ हाला पहार मेदिनि तस । जस चाला चलनी भरि चाला। मिरित पवन डोला लोक ज्यों रा हिंडोला। सरग पताल खट । गिरि पहार परबत ढहि गए। मात कीच भए । सम्द्र मिलि धरती फाटि, लात भंहरानी । पुन्नि इ मया जी सिष्टि समानी ॥ जो अस खंभन्ह पाई , सहस जीभ गहिराई। । सो आम कीन्ह मुहम्मद, तोह आम बपुरे काहें सूरु () सेवक ताकर अहै। घाटी पहर फिरत ज रहे। प्रस घायसू लिए रात दिन धावै। सरग पताल द पि.रि आवे ॥ अचव धि संसारा दगधि नागि महें होइ गरा। तेहि के ॥ सो स बपूरे गहनें लीन्हा। श्र बरि वांवि चंडाले दीन्हा ॥ गा अलोप हो, भा गुंधियारा । दग्लै दिनदि सरग महें तारा । उवरों .थि नीन्सआप चपे। लाग सरग जिट कर थर कांपे 17 , ड के परे ज्ञान सब । तब होइ मोख गहन जौ छूटे ॥ ताकतें ए तरा, जो, सेवक अस नित ! बह न डरमि ‘मुहम्मद, काह रहसि निहचित ॥ ५ ता प्रस्तुति कीन्हि न जाई। कौने जीभ में कर्फ बड़ाई ? ॥ जगत पताल जो ते कोई। लेखनी बिरिख, समुद मसि होई!! लगे लिफ सिप्टि मिलि जाई। समद घटे, पैसे लिखि न सिराई ! सांचा सोइ और सब भूठे ढाबें न कतईं औोहि के रूठे आासु इबलीस हु नौ टारा। नारद होइ नरक महें पारा ॥ स सी दुइ कटक, कह3 लखि' घोरा। फरहें रोधि नील महें बोरा ॥ जी वकुछ सँवारा । पैठत पौरि बच गहि मारा। । शदाद (४) उधत नार = उद्धढ़तचार, उत्पात। अावत...कुलाना = ज्ञान पड़त। है, जिस दिन मलिक मुहम्मद पैदा हुए थे उस दिन भारी भूकंप आया था। भार्थी फिराया चाल दान्है= । = छलनी में डाला हु आा अनाज । पवन बट . पवन ख टोला खभन्ह = थत् पहाड़ों को (वरतो पहाड़ों से कीली कही गई है) । गहिरातें पर गहराई या पाताल में थामे हैं । (५) 1ध = तपता है । धरिचंडाले दोन्हा मुये = प्रवाद है कि चंद्र डोम या डालों के ऋगी हैं इसी से हण द्वारा बार बार सताए जाते हैं । । घु प = अंकार । ६) 'त = इकी करे। सिई =चुकेपुरा हो । इबलीस = फरिश्ता जो पीछे शैतान । = हथाजिसने इसराईल फर* मित्र का बादशाह के वंश वालों को शदाद सताया था । = , एक प्रतापी बादशाह शद्दाजिसने खुदाई का दावा किया था और बिहिश्त के नने अरम पर ' नाम का बाग बनवाया था । यह बाग हजरत में बारह कोस बा था । इसमें अनेक प्रकार के सुंदर