जो ठाकुर अस दारुन, सेवक तहँ निरदोख ।
माया करै 'मुहम्मद', तौ पै होइहि मोख ॥ ६ ॥
रतन एक बिधनै अवतारा । नावँ 'मुहम्मद' जग उजियारा ॥
चारि मीत चहुँ दिसि गजमोती । माँझ दिपै मनु मानिक जोती ॥
जेहि हित सिरजा सात समुंदा । सातहु दीप भए एक बंदा ॥
तर पर चौदह भुवन उसारे । बिच बिच खंड बिखंड सँवारे ॥
धरती औ गिरि मेरु पहारा । सरग चाँद सूरज औ तारा ॥
सहस अठारह दुनिया सिरजैं । आवत जात जातरा करैं ॥
जेइ नहिं लीन्ह जनम महँ नाऊँ । तेहि कहँ कीन्ह नरक महँ ठाऊँ ॥
दोहा
सो अस दैउ न राखा, जेहि कारन सब कीन्ह ।
दहूँ तुम काह 'मुहम्मद' एहि पृथिवी चित दीन्ह ॥ ७ ॥
बाबर साह छत्रपति राजा । राज पाट उन कहँ बिधि साजा ॥
मुलुक सुलेमाँ कर ओहि दीन्हा । अदल दुनी ऊमर जस कीन्हा ॥
अली केर जस कीन्हेसि खाँड़ा । लीन्हेसि जगत समुद भरि डाँड़ा ॥
बल हमजा कर जैस सँभारा । जो बरियार उठा तेहि मारा ॥
पहलवान नाए सब आदी । रहा न कतहु बाद करि बादी ॥
बड परताप आप तप साधे । धरम के पंथ दई चित बाँधे ॥
दरब जोरि सब काहुहि दिए । आपुन बिरह आउ जस लिए ॥
दोहा
राजा होइ करै, सब, छाँड़ि, जगत महँ राज ।
तब अस कहँ 'मुहम्मद', वै कीन्हा किछु काज ॥ ८ ॥
मानिक एक पाएउँ उजियारा । सैयद असरफ पीर पियारा ॥
जहाँगीर चिस्ती निरमरा । कुल जग महँ दीपक बिधि धरा ॥
औ निहंग दरिया जल माहाँ । बूड़त कहँ धरि काढ़त बाहाँ ॥
समुद माहँ जो बोहति फिरई । लेतै नावँ सीधैं होइ तरई ॥
तिन्ह घर हौं मुरीद, सो पीरू । सँवरत बिनु गुन लावै तीरू ॥
कर गहि धरमपंथ देखावा । गा भुलाइ तेहि मारग लावा ॥
जो अस पुरुपहि मन चित लावै । इच्छा पूजै , आस तुलावै ॥
दोहा
जौ चालिस दिन सेवै, बार बुहारै कोइ ।
दरसन होइ 'मुहम्मद', पाप जाइ सब धोइ ॥ ९ ॥
अनुपम वृक्ष और भवन थे । इसके तैयार हो जाने पर ज्योंहीं वह इसके भीतर घुसना चाहता था कि ईश्वर के कोप से दरवाजे पर ही उसके प्राण निकल गए । सेवक तहँ = अपने बंदों या भक्तों के लिये । निरदोख = अच्छे स्वभाव का, सुशील । (७) तर पर = नीचे ऊपर । उसारे = खड़े किए, स्थापित किए (८) ऊमर = खलीफा उमर । पहलवान = योद्धा, वीर । नाए = झुकाए । आदी = पूरे, बिलकुल । आउ जस = आयु भर की कीर्ति । (९) निहंग = बिलकुल । बार = द्वार ।