पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४७९

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आखिरी कलाम २७ जायस नगर मोर प्रस्थान । नगर क नार्वे आदि उदयान । तहाँ दिवस दस पहने जाएगें। आप बैराग बहुत सुख पाएगें। सख भा, सोचि एक दिन मान। श्रोहि बिनु जिवन मरन के जान ॥ नैन रूप सो गएड समाई ॥ रहा पूरि भर हिरदय छाई ॥ जहने देख तहब सोई। और न आाव दिस्टि तर कोई ॥ जामुन देखि देखि मन राखीं। दूसर नाहैि, सो कास भाखीं। प्राहि देखा सब जगत दरपन के लेखा। प्रापन दरसन ॥ अपने ककुत कारन, मीर पसारिन हाट । मलिक मुहम्मद बिहने, होइ निक सिन तेहि बाट 1१०। धूत एक मारत गनि गना। कपट रूप नारद करि चना। ‘न , माधि कहावे। तेहि लगि चले जौ गारी पावें !। नायें सT। भाव गाँदि आम मखकर भाँजा। कारिश । तेल Iल मग्ष माजा । परतहि दीठि ज़रत मोहि ‘ लेखे । दिनहैि म. ऑधियर मुग्व देखे ॥ लीन्हे चंग राति दिन रहई । परपंच कीन्ह लोगन मह चह कहादें भाइ बंधु महें लाई लाव। बाप पूत महें कहें मेहरी आस रैनि के प्रावै। तरड़ के पूरुख औोनवाबे ॥ मन मैली , के ठगि, ठठ न पायी काह । वर सबहि ‘मुहम्मद, अस जिन तुम पतियाहू 31११॥ अंग। चढ़ाव सूरी भारा। जाइ गहौ तब चंग अधारा 17 जो काह स, ग्रानि चिट। सनह मोर विधि कैसे टैं । आ देऊ उहै ले। पढ़ी पलीता न बरता कर , जा यह धुव नासिक हि लाशें। मिनती करें औी 2ि 2ि भागे । धरि बार्ड लट सीस चेकोरे । करि पाँ टर, गहि हाथ रोगे । तबहि अधिक मोहि होवे। ‘ सैंकोच छडह, छह !' कहि के रोने ॥ घरि बाहीं ले थवा उड़ानें। तासरे जो रास छोड़ावै । । है नरकी पापी, टेढ़ बदन औौ अखि । अ चीन्हत उहै 'मुहम्मद, भूट भरी सब सावि १। ।। ठग । (१० ) उदयानु = ‘जायस' का यही पुराना नाम वहाँ के लोग बतलाते हैं । सब अवध ) । मीर सरदार, यहाँ परमेश्वर। बिह= सबेरे, प्रातकाल । ही (११) धूत == । नारद = शैतान से नवें न सiधु = ईश्वर का नाम न जप । भाव गठि : पर ऐसा हाव दन।कर हाथ भाT मुह । से ऐसे ऐसे इशारे करती है। कारिख = काजल, मिस्सी, तेल आदि स्त्रियों का गार। ध रा लाई भगड़ा गाती । मेहरी = नी यर । लावै = ल है । , जरू । तरपड़ = । = है । नीचे ोन वावं कती कै टरीि - टग करके । (१२) लेक = । (अवधी) भारा = = चिमटेदगे । ले देउ = दे । भाला। चिह्न थवा उड़ावं ; । = धू धू करेयूके सखि = विश्वास वचन । दिलाकर बहे हुए है