पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४८२

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आखिरी कलाम

o o आखिरी कलाम ज भुवन चौदहो गिरि मन डोला। जानौ बालि ऋलाव हिंडोला ॥ पहिले एन फूक जो आाई । ड नोच एक सम होइ जाई ॥ नदी नार हैं पाटी । अस होइ मिले ज्यों ठाढ़ो माटी ॥ सब। दूसरि "क जो गेरु उड़हैं । परबत समुद एक होइ हैं । चाँद सुरंज तारा घट टूटे। परतहि खंभ सेस घट फूटे !। तिसरे बजर महाउध, नस भुईं लेव महा । पूरय प0िॐ ‘महम्मद, एक रूप होइ जा 1१६। । आ जराइला •ह गि बोला। जी जहाँ लगि सवें लिया ॥ पहिले जि४ जिवरैल क लेई । लोटि जी काइल देई ॥ पुनि जि३ देइहि इसराफील ! तीनिह कहूँ मारै जराईलू काल फिरिस्तन केर जो होई । कोई न जारी, निसि असि होई ।। पुनि पुव जम ? सब जि लोन्हा। एकौो रहा ठाँचि जो दन्हा ? ॥ सुनि अजराइल आगे हो जाउव। उत्तर देवसीस भुई नाउब ॥ चाय हो करों व साई । की हम, की तुम, ऑौर न कोई ॥ जो जम ग्रान जिड लेत हैं, संकर तिनत कर जिड लेब । सो अवतरें 'महमद, देबु तजिउ देव !२०॥ पुनि फरमाए प्रायु गोसाई । तुम. टेड जिवाइहि नाहीं ॥ सुनि श्रायब पाछे कहें ढाए। तिसरी पौरि नाँधि नहि पाए। परत जीउ जब निसरन लागे। होझ बड़ कष्ट, घरों एक जागे ॥ प्रान देत वरै मन महाँ । उबत प धरि ावत 'बाहाँ । जस जिड देत मोहि दुख होई। ऐसे दर्जे हम सब कोई ॥ जौ जनत्यों अस व जिड़ देता। त जिर काह केर न लेता ॥ लौटि काल तिनहें कर होवें। श्राई नींद, निरक हो सो6 ॥ भंजन, गढ़न सँवारन, जिन खेल सब खेल । सब कहूँ टारि 'मुहम्मद, अब हो रहा अकेल ।२१। चालिस बरस जवजह होड़ जैहैं। औ हि मथा, पतेि सध ऐहैं । मया मोह के किरपा ग्राए। ।हि काहि आाष फरमाए ॥ संसार जो सिरजा ए मोर न कोई नहि लेता ॥ लपत लचता है। = । खंभ = स्तंभ रूप पर्वत । वजर = व। महाउब = मथाएगा। () ज़राईल फरिश्ता 1 पुति पूज़व = खुदा फिर पूछेगा । २० = मानवाला ाँचि जो दोहा = जिसको बना दिया । की हम को तुम - अब तो बस हम ह! या तुम हो । जम = यमराज जो पैगंबरी मजहबों में जराईल कहलाता है। हैं । तहूँ ८ न भी। (२१) टाए = ढह संकर = शंकरशिव जो महाकाल पड़ेगिर पड़े । उवत धूप छाहाँ = अंत समय में जब ज्ञान होता हैमृत्यु तब का अंधकार घेर लेता है। ।