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पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४८९

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आखिरी कलाम

पुनि रसूल तलफत तह जैहैं । बीबिकहि बार बार समुझैहैं ॥
'बोदी कहब, घाम कत सहहु ? । कस ना बैठि छाह महँ रहहु ? ॥
'सब पैगंबर बैठे छाहीं । तुम कस तपौ बजर अस माहाँ ? ॥
'कहब रसूल, छाँह का बैठौं ? । उमत लागि धूपह नहिं बैठी ॥
'तिन्ह सब बाँधि घाम मह, मेले । का भा मोरे छाह अकेले ॥
'तुम्हरे कोह सबहि जो मरे । समुझहु जीउ, तवहि निस्तरे ॥
'जो मोहिं वही निवारहु कोहू । तब बिधि करे उमत पर छोहू' ॥
वह दुख देखि पिता कर, बीबी समुझा जीउ ।
जाइ मुहम्मद विनवा, ठाढ़ पाग के गोउ ॥ ४१ ॥

तव रसूल के कहँ भइ माया । जिन चिंता मानहु, भइ दाया ॥
जी बीबी अबहूँ रिसिआई । सबहि उमत सिर आड बिसाई ॥
अब फातिम कह बेगि बोलावह । देइ दाद तौ उमत छोड़ावह ॥
फातिम आइ कै पार लगावा । धरि यजीद दोजख मह गवा ॥
अंत कहा, धरि ज्ञान से मारै । जीउ देइ देइ पुनि लोटि पछारै ॥
तस मारब जेहि भुइँ गड़ि जाई । खन खन मारै लोटि जियाई ॥
बजर अगिन जारब के छारा । लोटि दहै जस दहै लोहारा ॥
मारि मारि घिसियावैं, धरि दोजख मह देव ।
जेतनी सिस्टि 'मुहम्मद', सबहि पुकारै लेब ॥ ४२ ॥

पुनि सब उमत लेब बुलाई । हरु गुरु लागब बहिराई ॥
निरखि रहैती काढ़ब छानी । करब निनार दूध औ पानी ॥
बाप क पूत, न पूत क बापू । पाइहि तहाँ न पुत्रि न पापू ॥
आपहि आप आइ कै परी । कोउ न कोउ क धरहरि करी ॥
कागज काढ़ि लेब सब लेखा । दुख सुख जो पिरथथी महँ देखा ॥
पुनि पियाला लेखा माँगब । उतर देत उन पानी खाँगब ॥
नैन क देखा स्रवन क सुना । कहब, करब, औगुन औ गुना ॥
हाथ, पाँव, मुख, काया, स्रवन, सीस औ आँखि ।
पाप न छुपै 'मुहम्मद', आइ भरै सब साखि ॥ ४३ ॥

देह क रोवाँ बैरी होइहैं । बजर बिया एहि जीउ क रोइहैं ॥
पाप पुन्नि निरमल कै धोउब । राखब पुन्नि, पाप सब खोउब ॥


(४१) बजर धूप । समुझहु जीउ अपने जी में ढ़ाढ़स बाँधो । पाग के गोउ = गले में पगड़ी डालकर, बड़ी अधीनता से । (४२) यजीद = जिसने हसन हुसैन को मारा था । गवा = गया । घिसियावैं = घसीटते हैं । पुकारै लेब = पुकार लेंगे । (४३) हरु = हलका, ओछा । गुरु = भारी, गंभीर । बहिराइ लागब = निकलने लगेंगे । रहैती = रहन सहन, आचरण । निनार = न्यारा, अलग । धरहरि = धर पकड़, सहायता । करो = करिहि, करेगा ।