पुनि कौसर पठउब अन्हवाव । जहाँ कया निरमल सब पाव ॥
बुड़की देब देह सुख लागी । पलुहब उठि, सोवत अस जागी ॥
खोरि न्हाइ धोइ सब दुंदू । होइ निबरहिं पुनिउ के चंदू ॥
सब क सरीर गुवास बसाई । चंदन के अस घानी आई ॥
झूठे सबहि, आप पुनि साँचे । सबहि नबी के पीछे वाँचे ॥
नविहि छाँड़ि होइहि सबहि, बारह बरस क राह ।
सब अस जान 'मुहम्मद', होइ बरस के राइ ॥ ४४ ॥
पुनि रसूल नेवतब जेवनारा । बहुत भाँति होइहि परकारा ॥
ना अस देखा, ना अस सुना । जौ सरहीं तौ है दस गुना ॥
पुनि अनेक बिस्तर तहँ डासब । बास सुबास कपूर ते बासब ॥
है आयसु जौ बेगि बोलाव । औ सब उमत साथ लेइ आउब ॥
जिबरईल आगे होइ जइहैं । पग डारै कहँ आयसु देइहैं ॥
चलब रसूल उमत लेइ साथा । परग परग पर नावत माथा ॥
'आबहु भीतर' बेगि बोलाव । बिस्तर जहाँ तहँ बैठाउब ॥
भारि उमत सब बैठी, जोरि के एकै पाँति !
सब के माझ 'मुहम्मद', जानौ दुलह बराति ॥ ४५ ॥
पुनि जेवन कह आवै लागी । सबके आगे धरत न खाँगी ॥
भाँति भाँति कर देखब धारा । जानब ना दहू कौन प्रकारा ॥
पुनि फरमाउब आप गोसाईं । बहुतै दुख देखेउ दुनियाईं ॥
हाथन्ह से जेवन मुख डारत । जीभ प्रसारत दाँत उघारत ॥
कूँचत खात बहुत दुख पाए । तहँ ऐसे जेवनार जेवैं ॥
अब जिन लँटि कस्ट जिउ करहू । सुख सवाद औ इंद्री भरहू ॥
पाँच भूत आतमा सेराई । बैठि अघाउ, उदर ना भाई ॥
ऐस करब पहुनाई, तब होइहि संतोख ।
दुखी न होहु 'मुहम्मद', पोखि लेहु फुर पोख ॥ ४६ ॥
हाथन्ह से केहु और न लेई । जो चाह मुख पैठे सोई ॥
दाँत, जीभ, मुख किछु न डोलाव । जस जस रचि है तस तस खाउब ॥
जेस अन्न बिन कूँचे रँचै । तैस सिठाइ जी कोऊ कूँचै ॥
(४४) कौसर = स्वर्ग की एक नदी या चश्मा । बुड़की = गोता । पलु- हेर । (४५) जौ सरहीं...दस गुना = यदि सराहता हूँ तो उसका दसगुना ठहरता है । (४६) तहँ संसार में । लँटि = स्वर्ग में लौट आकर । सेराई = शीतल तुष्टि । उदर ना भाई = यहाँ पेट नहीं है जिसे भरना पड़े । (४७) तैस सिठाइ... कूँचै = कूँचने पर वह वैसा ही सीठी सा नीरस लगता है ।