पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४९३

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आखिरी कलाम ३११ खड़े एक एक कह डीन्ह निवासू । जगत लोक विरसे कविलागू चालिस चालिस ट्रें सोई। औ संग लागि बियाही जोई गौ सेवा कई अछरैन्ह केरी। एक एक जनि अहें सी सौ चेरी ऐसे जतन बियाहैं, बरियात ‘मुहम्मद बिहिस्त चले बिहंसात ५३। इतात कह धाए। चोल यानि उम्मृत पहिराए । पहिरहु दगल सुरंग रेंग राहे । करहु सोहाग जन३ मद माते चंद बदन औ कोकब मोहै ।। ताज कुलह सिर मुहम्मद सोहै हाइ खोरि अक्षस बनी बराता । नवी तंबोल खात मुग्व राता तुम्हरे फ्लेचे उमत सब् आनुबं। वो संवादूि बह भाँति बखानुझे गिरत मदमाते ऐहैं। चढ़ि के घोड़न कहें कुदर जिन भरि जलम बहुत हिय जारा। बैठि पाँव देश जमै ते पारा ॥ जैसे नबी सवारे, तैसे बने पुनि साज दूलह जतन ‘मुहम्मद, विहिस्त कर सुख राज !५४। माथे । औ पहिएं फूलन्ह बिनु गाँथे जतन होब असवारा । लिए बराते हैं संसारा गर्मीि रचि शुछरिन्ह कीन्द्र सिंगा। बास सुबास गूंज रसूल बियाहन एहैं। सब दुलहिन दुलह सहु । प्रारति करि सब आगे ऐहैं नंद सरोदन सब मिलि हैं दिरन्ह होझहि सेज बिछावन । सबहि कहें मिलिटू रावन बाजन बाऊँ विहिस्त दुबारा । भीतर गीत उठे झनकारा बनि बनि बैठो अछरीबैठि जोहैं कबिलास गिहि नाउ 'महम्मद, पूजे मन ास 1५५। जिबरईल पहिले से जे जाइ रसूल बिहिस्त नियरेहैं। लिहैं प्राठौ पंवरि द्वारा । ओौ पैठे लार्ग संकल लोग जब भीतर हैं। पाछे होझ रसूल सिधुहैं मिलि ट्रें नेवछाबरि करिहैं। सबके मुखेन्ह फूल आस झरिहैं। रहसि रसि तिन करब किड़ाअगर कुंड मा भरा सरीरा बेंत भाँति कबू नंद सरोदू। बास सुबास उठे परमोदू कस्तूरी। दिर सुबास रहब भरपूरी लत महकारा अगर, कपूर, बना, ऐसे जतन बिरसे = विलास करते हैं ।र = बिहिश्त की अप्सरा । जोई =जोय, स्नी। ऐसे ढंग से, इस प्रकार। (५४) इतात = आज्ञापालन । चोल वनपहनावा। दगल = लंबा नगरखा। कुलह टोप। बहुत हि जारा ईश्वर के विरह में लीन रहे। जतन = प्रकार, समान । (५५) नंद आनंद मुराद =स्वरू। (फारसी)। रावन = रमण करनेवाला, प्रियतम । (५६) पंवरि = ड्यौढ़ी