पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/५९

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( ३६ ) साजन लेइ पठावा, मायसु जाइ न मेट तन, मनजीवन साजि के देड़ चली लेइ भेंट ॥ इस दोहे में तनमन और यौवन तीनों का अलग अलग उल्लेख बहुत ही सुंदर है। मन का सजाना क्या है ? समागम की उत्कंठा या अभिलाष । बिना इस मन की तैयारी के तन की सब तैयारी व्यर्थ हो जाती है । देखिएप्रिय के पास गमन करते समय कविपरंपरा के अनुसार शेष सष्टि से चुनकर सौंदर्य का कैसा संचार कैसी सीधी सादी भाषा में किया गया है पदमिनि गवन हंस गए दूरी । कुंजर लाज मेल सिर धूरी ॥ बदन देख घटि चंद समाना । दसन देखि के बीजू लजाना ॥ खंजन छपे देखि के नैना । कोकिल छपी सुनत मध्र बैना ॥ पहुँचहि छपी कंवल पौनारी । जाँघ छपा कदली होइ बारी संयोगवर्णन में जायसी पहले तो सहसा सौंदर्य के साक्षात्कार से हृदय के उस फिर यानंदसंमोह राजा अपने का वर्णन दु:ख करते की कहानी हैं जो मूच्छ और प्रेममार्ग की दशा ए में तक अपने पहुँचा ऊपर हा पड़े जान हुए पड़ता संकट . है का । वर्णन करके प्रेममार्ग की उस सामान्य प्रवृत्ति का परिचय देता है जिसके अनुसार प्रेमी अपने प्रियतम के हृदय में अपने ऊपर दया तथा करुणा का भाव जाग्रत करने का बराबर प्रयत्न किया करता है । इसी प्रवत्ति की उत्कर्षव्यंजना के लिये फारसी या उर्दू शायरी में मुर्दे अपना हाल सुनाया करते हैं । सबसे बड़ा दुःख होने के कारण ‘मरणदशा' के प्रति सबसे अधिक दया या करुणा का उद्घक स्वभावसिद्ध है। शत्रु तक का ऋण सुनकर सहानुभूति का एक प्राध शब्द "ह से निकल ही जाता है। प्रिय के मुख से सहानुभूति के वचन का मूल्य प्रेमियों के निकट बहुत अधिक होता है, बेचारा बहुत अच्छा था', प्रिय के मुख से इस प्रकार के शब्दों की संभावना ही पर वे अपने मर जाने की कल्पना बड़े ग्रानंद से किया करते हैं । जो हमें अच्छा। लगता है उसे हमारी भी कोई बात अच्छी लगेयह अभिलाषा प्रेम का एक विशेष लक्षण है । इस अभिलाषपूत की प्राशा प्रिय के हृदय को दयाई करने में सबसे अधिक दिखाई पड़ती है, इसी से प्रेमी अपने दु:ख और कष्ट की बात बड़े तूल के साथ प्रिय को । सुनाया करते हैं। । नायक नायिका के बीच कुछ वाक्चातुर्य औौर परिहास भी भारतीय प्रेम प्रवृत्ति का एक मनोहर अंग है, अतः उसका विधान यहाँ के कवियों की श्रृंगार पद्धति में चला जा रहा है । फारसी, अँगरेजी आदि के साहित्य में हम इसका विधान नहीं पाते । पर नए प्रेम से प्रभावित प्रत्येक भारतीय हृदय इस प्रवृत्ति का अनुभव करता है । देश औौर काल के भेद से हृदय के स्वरूप में भी भेद होता है । भारतीय प्रकृति के अनुसार संयोग पक्ष की नाना वत्तियों का भी कुछ विधान हो जाने से जायसी का प्रेम प्रंानंदी जीवों द्वारा बिलकुल मुहर्रमी' कहे जाने से बाल बाल बच गया है । पीछे तो उर्दी वालों में भी 'खूबाँ से छेड़छाड़की रस्म चल पड़ी। राजा की सारी कहानी सुनकर पद्मावती कहती है कि तू जोगी और मैं रानी, तेरा मेरा कैसा साथ ?"